भारत-अमेरिका के बीच व्यापार करीब 130 अरब डॉलर का है और इसमें भारत का निर्यात करीब 87 अरब डॉलर का है। भारतीय उद्योगों की तरफ से अमेरिका को उत्पादों से लेकर सेवाओं तक का निर्यात किया जाता है। ऐसे में अब अमेरिका की तरफ से टैरिफ लगाए जाने के एलान के बीच इसके असर को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से भारत से किए जाने वाले आयातों पर 25 फीसदी टैरिफ लगाने का आदेश सात अगस्त से प्रभावी होगा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस बाबत गुरुवार शाम सात बजे के बाद (अमेरिकी समयानुसार) एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए। इस आदेश में अमेरिका के कई व्यापारिक साझेदारों पर नए टैरिफ लगाए गए हैं। जो 7 अगस्त से प्रभावी होंगे। पहले यह टैरिफ आज यानी एक अगस्त से ही प्रभावी होगा था। यह उनके व्यापार एजेंडे का अगला कदम है। एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि टैरिफ को बाद में लागू किया जा रहा है ताकि दरों की समय-सारिणी में सामंजस्य स्थापित किया जा सके।
इसी के साथ भारत से अमेरिका निर्यात किए जाने वाले अधिकतर उत्पादों का वहां महंगा होना तय है। माना जा रहा है कि इससे भारतीय निर्यातकों को झटका लग सकता है, क्योंकि अमेरिका भारतीय उत्पादों का बड़ा खरीदार है और अगर भारत से भेजे जाने वाले सामान पर अमेरिकी टैरिफ बढ़ जाता है तो वहां नागरिक भारतीय उत्पादों की जगह दूसरे देशों से कम टैरिफ दर पर आने वाले सामान को तरजीह दे सकते हैं।
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार करीब 130 अरब डॉलर का है और इसमें भारत का निर्यात करीब 87 अरब डॉलर का है। भारतीय उद्योगों की तरफ से अमेरिका को उत्पादों से लेकर सेवाओं तक का निर्यात किया जाता है। ऐसे में अब अमेरिका की तरफ से टैरिफ लगाए जाने के एलान के बीच इसके असर को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
मसलन- भारत और अमेरिका के बीच व्यापार से जुड़े मौजूदा आंकड़े क्या हैं? भारत के किन-किन सेक्टर्स पर ट्रंप के फैसले का सबसे ज्यादा असर पड़ने की संभावना है? इसके अलावा ट्रंप ने जो रूस के साथ भारत के व्यापार को लेकर पेनाल्टी लगाने की धमकी दी है, उसका आने वाले समय में किन क्षेत्रों में असर पड़ सकता है?
इसी साल अप्रैल में जब ट्रंप ने पहली बार अलग-अलग देशों पर पहली बार आयात शुल्क लगाने का एलान किया था, तब अमर उजाला ने इस मुद्दे पर केडिया सिक्योरिटीज के निदेशक और रिसर्च हेड अजय केडिया से बात की थी। उन्होंने बताया था कि भारत ने अमेरिका से आयात होने वाली कई चीजों पर टैरिफ लगा रखा है। ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप की कोशिश है कि वह भारत पर जवाबी आयात शुल्क लगाएं। इसलिए जो प्रभाव रहेगा, वह हमारे आईटी सेक्टर, टेक्सटाइल, एग्रीकल्चर पर असर पड़ सकता है। अभी दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय वार्ता जारी है। उदाहरण के तौर पर अगर अमेरिका ने भारत से आयात किए गए चावल पर 25 फीसदी टैरिफ लगाया तो पहले 100 रुपये में भारतीय चावल पा रहे अमेरिकी नागरिकों को अब आयात शुल्क के साथ 125 रुपये में चावल मिलेगा। यही स्थिति अलग-अलग सेक्टर्स के उत्पादों की रहेगी।
अब जानें- किन सेक्टर्स पर सबसे ज्यादा असर पड़ने की संभावना?
1. इलेक्ट्रॉनिक्स
भारत का इलेक्ट्रॉनिक सेक्टर अमेरिका को सबसे ज्यादा निर्यात करने वाला सेक्टर है। बीते कुछ वर्षों में भारत स्मार्टफोन्स से लेकर लैपटॉप, सर्वर और टैबलेट्स के मामले में अमेरिका का सबसे बड़ा निर्यातक बना है। ऐसे में 1 अगस्त से लागू होने वाले अमेरिकी टैरिफ का सबसे ज्यादा असर इसी सेक्टर पर पड़ने की संभावना है। हालांकि, न्यूज एजेंसी पीटीआई ने गुरुवार को सरकारी सूत्रों के हवाले से बताया कि अमेरिका में इस सेक्टर पर आयात शुल्क लगाने के लिए उसे सेक्शन 232 की समीक्षा करनी पड़ेगी, जिसकी तय तारीख दो हफ्ते बाद है। यानी दो हफ्ते के लिए इस सेक्टर को अमेरिकी टैरिफ से राहत मिलने का अनुमान है।
2. टेक्सटाइल
भारत का कपड़ा उद्योग के निर्यात का बड़ा हिस्सा भी अमेरिका पर निर्भर है। आंकड़ों की मानें तो भारत से होने वाला कुल टेक्सटाइल निर्यात का 28 फीसदी अकेले अमेरिका को जाता है। ऐसे में 1 अगस्त से लगने वाले टैरिफ का असर इस सेक्टर पर सबसे ज्यादा पड़ेगा। दरअसल, अमेरिका ने बीते वर्षों में भारत के साथ-साथ वियतनाम, इंडोनेशिया और बांग्लादेश से बड़ी मात्रा में टेक्सटाइल उत्पादों का आयात किया है। जहां वियतनाम पर फिलहाल अमेरिका 19 फीसदी टैरिफ लगा रहा है, वहीं इंडोनेशिया पर ट्रंप ने 20 फीसदी टैरिफ लगाया है। इस लिहाज से भारत के टेक्सटाइल सेक्टर को अमेरिकी टैरिफ के चलते प्रतियोगिता में नुकसान होने की संभावना है।
गौरतलब है कि इस सेक्टर में बांग्लादेश और कंबोडिया भी भारत से प्रतियोगिता में रहे हैं, लेकिन अमेरिका ने इन देशों के ऊपर ज्यादा टैरिफ लगाया है। बांग्लादेश पर अमेरिका का आयात शुल्क 35 फीसदी तो कंबोडिया पर 36 फीसदी है।
3. फार्मा
भारत के फार्मा सेक्टर के लिए अमेरिका सबसे बड़ा गंतव्य है। रिपोर्ट्स की मानें तो भारत का अमेरिका को कुल निर्यात 10.5 अरब डॉलर का रहा है। यानी भारत के कुल फार्मा निर्यात का करीब 40 फीसदी हिस्सा अमेरिका को ही जाता है। ऐसे में ट्रंप के टैरिफ का असर इस सेक्टर को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। इस बीच विश्लेषकों ने दावा किया है कि भारत के इस सेक्टर को फिलहाल ट्रंप के 25 फीसदी टैरिफ के दायरे से बाहर रखा गया है।
ब्रोकरेज हाउस जेफरीज ने कहा है कि अभी के लिए भारतीय फार्मा सेक्टर पर ट्रंप के जवाबी टैरिफ का न्यूनतम प्रभाव पड़ेगा, लेकिन भविष्य में किसी अतिरिक्त टैरिफ से इनकार नहीं किया जा सकता है। गुरुवार को फार्मा सेक्टर्स के शेयर्स में भी थोड़ी गिरावट देखी गई।
4. रत्न-आभूषण
भारत के रत्न और आभूषण से जुड़े सेक्टर पर अमेरिकी टैरिफ का बड़ा प्रभाव पड़ने की आशंका है। इन उद्योगों में चर्चा है कि अमेरिका की तरफ से टैरिफ लगाए जाने के बाद अधिकतर रत्न और आभूषणों के दाम बढ़ जाएंगे, जिससे इनकी खरीद कम हो जाएगी और इस उद्योग के लाभांश में कमी आ सकती है। मौजूदा समय में इस उद्योग पर अमेरिका का बेसलाइन 10 फीसदी टैरिफ लगता है, जिसका एलान अप्रैल में ही किया गया था, जबकि इससे पहले तक यह ड्यूटी पॉलिश्ड हीरों पर शून्य, सोने और प्लैटिनम ज्वैलरी पर 5-7 प्रतिशत और चांदी की ज्वैलरी पर 5-13.5 फीसदी तक टैरिफ लगता था।
5. कृषि उत्पाद
भारत फिलहाल अमेरिका को 5.6 अरब डॉलर से ज्यादा के कृषि उत्पाद निर्यात करता है। उसके बड़े निर्यातों में से मरीन उत्पाद, मसाले, डेयरी उत्पाद, चावल, आयुष और हर्बल उत्पाद शामिल हैं। वहीं, खाद्य तेल, शक्कर और ताजा सब्जियां और फल भी निर्यात का हिस्सा हैं। माना जा रहा है कि ट्रंप के 25 फीसदी टैरिक का सबसे ज्यादा असर भारत की सीफूड इंडस्ट्री यानी मरीन उत्पादों पर पड़ेगा।
ट्रंप के पेनाल्टी लगाने की धमकी का किन सेक्टर्स पर हो सकता है असर?
अमेरिकी राष्ट्रपति ने धमकी दी है कि रूस से हथियार और ऊर्जा क्षेत्र में बड़े स्तर पर आयात करने वाले भारत पर वे टैरिफ के ऊपर अतिरिक्त जुर्माना यानी पेनाल्टी लगा सकते हैं। फिलहाल ट्रंप ने यह साफ नहीं किया है कि यह पेनाल्टी कितनी होगी, लेकिन भारत के लिए इन दोनों सेक्टर्स पर बड़ा असर पड़ सकता है।
मौजूदा समय में कितना है भारत-रूस का व्यापार, जिसके प्रभावित होने की संभावना?
भारत-रूस के बीच किन व्यापार क्षेत्रों पर अमेरिका की पेनाल्टी का पड़ेगा असर?
1. ऊर्जा क्षेत्र
2023 के आंकड़ों के मुताबिक चीन और भारत ने समुद्री मार्ग से रूस से इतना तेल आयात किया, जितना पूरे यूरोपीय संघ के देशों ने नहीं किया। इस दौरान रूस के कुल तेल निर्यात का 85-90 फीसदी हिस्से के खरीदार चीन और भारत ही रहे। भारत ने इस पूरी अवधि में हर दिन 16 लाख से 17 लाख बैरल प्रति दिन तेल रूस से खरीदा। यह भारत की प्रतिदिन की तेल की जरूरत का 35 फीसदी है। भारत अपने तेल का बाकी हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों से खरीदता है।
भारत की तरफ से रूसी तेल पर निर्भरता बढ़ने की एक वजह रूस की तरफ से दी जाने वाली छूट है। आंकड़ों के मुताबिक, रूस-यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद से रूस ने भारत को 60 डॉलर प्रति बैरल से भी कम कीमत पर तेल मुहैया कराया है, जो कि यूरोपीय संघ की ओर से तय न्यूनतम कीमत से भी कम है। इसके चलते भारतीय तेल रिफाइनरीज को सस्ता तेल खरीदने में फायदा होता है। रूस के पक्ष में जाने वाली एक और बात यह भी है कि रूस का कच्चा तेल हल्का और सल्फर युक्त होता है, जो कि भारत के उद्योगों के लिए उपयुक्त माना जाता है, जबकि अमेरिका और पश्चिमी देशों का तेल कम सल्फर वाला होता है, जो कि भारत के रिफाइनिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिहाज से नहीं है।
ऐसे में अगर अमेरिका ने रूस से व्यापार करने वाले देशों पर टैरिफ के ऊपर जुर्माने का भी एलान किया तो भारत को तेल के आयात में नुकसान उठाना पड़ सकता है।
2. हथियार/रक्षा क्षेत्र पर
भारत और रूस ऐतिहासिक स्तर पर रक्षा क्षेत्र और हथियारों में व्यापार की वजह से काफी करीब रहे हैं। हालांकि, दोनों देशों के बीच बीते वर्षों में रक्षा लेन-देन में कमी भी देखी गई है। जहां 2010-14 में भारत की 72 फीसदी रक्षा खरीद अकेले रूस से होती थी तो वहीं 2015-19 के बीच यह आंकड़ा 55 फीसदी पर आ गया। 2020-24 के आंकड़ों को ले लिया जाए तो भारत के कुल रक्षा आयात में रूस की हिस्सेदारी 36 फीसदी रह गई है। इसकी वजह यह है कि भारत ने बीते वर्षों में फ्रांस, इस्राइल और अमेरिका से भी रक्षा उत्पाद आयात किए हैं। वहीं यूक्रेन के साथ युद्ध में घिरे होने की वजह से रूस के कुल निर्यात में भी कमी देखी गई है।
इसके बावजूद 2023 तक बीते दो दशकों में भारत ने करीब 60 अरब डॉलर के जो हथियार आयात किए, उसमें 65 फीसदी यानी करीब 40 अरब डॉलर के हथियार रूस से ही खरीदे हैं। भारत की सेना के तीनों अंग- थलसेना, वायुसेना और नौसेना तीनों ही रूसी हथियारों पर निर्भर हैं।
जहां भारत की थलसेना रूस की एके-203 बंदूकों से लेकर उसके टैंकों (टी-90, टी-72) और बख्तरबंद वाहनों का अहम सप्लायर है तो वहीं वायुसेना के अधिकतर विमान- मिग, सुखोई भी रूस द्वारा निर्मित हैं। इसके अलावा एमआई-17 हेलीकॉप्टर भी रूस से ही आयात किए जाते हैं। नौसैन्य क्षेत्र में रूस ने भारत को कई सबमरीन से लेकर जहाज तक मुहैया कराए हैं। इसके अलावा जरूरी उपकरणों में रूस से भारत को एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम, एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग सिस्टम, रडार, मिसाइलें भी मिली हैं। भारत की ब्रह्मोस मिसाइल के पीछे भी रूस का अहम किरदार रहा है।



