ब्रांड मोदी की चमक बरकरार: बिहार में एनडीए की ऐतिहासिक जीत, सामाजिक समीकरण और महिला वोटरों ने बदली तस्वीर

ब्रांड मोदी की चमक बरकरार: बिहार में एनडीए की ऐतिहासिक जीत, सामाजिक समीकरण और महिला वोटरों ने बदली तस्वीर

बिहार में एनडीए की बंपर जीत ने साबित किया कि विकास और बेहतर शासन के साथ सामाजिक समीकरणाें को साधकर चुनाव जीते जा सकते हैं। महिलाओं का भरोसा इस जीत में फिर बेहद अहम साबित हुआ है। जमीनी हकीकत, चुनाव प्रबंधन और जनप्रिय योजनाओं के साथ इस चुनाव के चार प्रमुख नायकों से मिलिए। 

एक जनसभा में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार में एनडीए की सबसे बड़ी जीत की भविष्यवाणी करते हुए लोगों से जश्न के लिए तैयार रहने का आह्वान किया था, तब राजनीतिक पंडितों ने इसे महज कार्यकर्ताओं का जोश बढ़ाने के रूप में देखा। नतीजों ने न सिर्फ उनकी भविष्यवाणी को सही ठहराया, बल्कि साबित किया कि विपक्ष के पास ब्रांड मोदी और मोदी करिश्मा का वाकई कोई जवाब नहीं है। लोकसभा चुनाव में ब्रांड मोदी की धुंधलाई चमक चंद महीने बाद हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और अब बिहार के रास्ते न सिर्फ लौट आई, बल्कि धमक पहले की तुलना में अधिक है। इसने कई मिथक भी तोड़ दिए।

इस चुनाव को मोदी मैजिक से अलग कर नहीं देखा जा सकता। कारण, जहां प्रधानमंत्री की जनसभाएं हुई, वहां न सिर्फ मतदान प्रतिशत में ऐतिहासिक उछाल आया, बल्कि एनडीए को बंपर जीत भी मिली। इसके अलावा प्रधानमंत्री ने अपने दम पर विपक्ष की गलतियों को राज्यव्यापी मुद्दा बनाते  हुए इसे राज्य के स्वाभिमान से जोड़ दिया। चाहे विपक्षी महागठबंधन के मंच से प्रधानमंत्री की मां को दी गई गाली हो या  फिर छठ के अपमान का मामला। प्रधानमंत्री ने मंझे हुए राजनीतिज्ञ की तरह इसे राज्य के स्वाभिमान  से जोड़ कर विपक्ष को चारों खाने चित कर दिया।

मजबूती से उठाया जंगलराज का मुद्दा
पूरे चुनाव प्रचार के दौरान पीएम ने राजद शासनकाल के जंगलराज को फिर से मुद्दों के केंद्र में खड़ा किया। तब कहा गया कि ढाई दशक पहले के लालू-राबड़ी राज का यह मुद्दा चुनाव में काम नहीं करेगा। हालांकि, पीएम ने अपनी हर जनसभा में लोगों को महागठबंधन के सत्ता में आने से जंगलराज की वापसी के प्रति लगातार आगाह किया। राजद समर्थकों के धमकी और आपत्तिजनक गानों को चर्चा के केंद्र में लाया।

विपक्ष को अपने पिच पर लाने में रहे सफल
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सेहत, नतीजे के बाद उन्हें सीएम नहीं बनाने जैसे मुद्दे पर विपक्ष एनडीए को घेरना चाहता था। पलायन और बेरोजगारी को भी मुद्दों के केंद्र में रखने की कोशिश हुई। हालांकि, पीएम मोदी ने छठ और अपनी मां के अपमान को बिहार के स्वाभिमान व अस्मिता से जोड़कर विपक्ष को अपने पिच पर खेलने को मजबूर कर दिया। इन मुद्दों को पीएम मोदी ने बेहद प्रभावी तरीके से स्वाभिमान  से जोड़कर विपक्ष को बैकफुट पर धकेल दिया।

छठ के अपमान मामले में पीएम का संदेश कारगर साबित हुआ कि एक तरफ वह इस महापर्व को यूनेस्को की विरासत बनाकर इसे वैश्विक मान्यता दिलाना चाहते हैं, वहीं विपक्ष इस महापर्व को ही खारिज कर रहा है। इसके अलावा, प्रधानमंत्री की मां के अपमान के मुद्दे ने महिला वर्ग के साथ-साथ प्रबुद्ध वर्ग को नाराज करने में बड़ी भूमिका निभाई।

ग्रामीण क्षेत्र और जाति केंद्रित राज्यों में कमजोरी का मिथक तोड़ा
परिणाम ने साबित कर दिया कि मौजूदा राजनीति में विपक्ष के पास फिलहाल ब्रांड मोदी का जवाब नहीं है। बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा के बहुमत से चूकने के बाद ब्रांड मोदी, मोदी करिश्मा, मोदी मैजिक पर सवाल उठे थे। हालांकि, बीते साल के अंत में पहले हरियाणा और फिर महाराष्ट्र में भाजपा की प्रचंड जीत, इस साल की शुरुआत में दिल्ली और अब बिहार में मिली सफलता ने साबित कर दिया कि ब्रांड मोदी की चमक पहले से ज्यादा तेज हुई है।

बिहार क्यों अहम
देश की तीसरी सबसे बड़ी आबादी और दूसरे सबसे बड़े ग्रामीण क्षेत्र वाले बिहार का यह परिणाम कई कारणों से बेहद अहम है। इस नतीजे ने भाजपा के ग्रामीण क्षेत्र में कमजोर आधार और जाति केंद्रित राज्यों में पार्टी के कमजोर पड़ने के मिथक को तोड़ा है। ऐसे राज्य में जहां एक तिहाई मतदाताओं की उम्र 29 वर्ष से कम हो वहां मोदी मैजिक के सहारे भाजपा को न सिर्फ अब तक की सबसे बड़ी जीत मिली, बल्कि वह लगातार दूसरी बार राज्य में बड़े भाई की भूमिका में है। चंद महीने बाद बिहार के पड़ोसी प. बंगाल में विधानसभा चुनाव हैं, जहां इस नतीजे का प्रभाव पड़ना तय है।

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