चिंताजनक: तेजी से बढ़ता कचरा पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा, 2050 तक 3.9 अरब टन पहुंचने का अनुमान

चिंताजनक: तेजी से बढ़ता कचरा पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा, 2050 तक 3.9 अरब टन पहुंचने का अनुमान

यूएनईपी आंकड़े बताते हैं कि तेजी से बढ़ता कचरा पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। दुनिया में उत्पादित कुल भोजन का लगभग पांचवां हिस्सा बर्बाद हो जाता है। इसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी घरों की है। रेस्टोरेंट, होटल और खुदरा क्षेत्र भी इसमें योगदान देते हैं। लेकिन रिपोर्ट के अनुसार बर्बादी का केंद्र घरेलू स्तर ही है, जो इस संकट को गहरा बना रहा है।

तेजी से बढ़ता कचरा पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा

दुनिया तेजी से कचरे के ऐसे संकट की ओर बढ़ रही है, जो आने वाले दशकों में पर्यावरण, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की ताजा रिपोर्टों के मुताबिक साल 2022 में वैश्विक स्तर पर करीब 2.6 अरब टन कचरा उत्पन्न हुआ जो 2050 तक बढ़कर 3.9 अरब टन तक पहुंच सकता है। वहीं, यूएनईपी की फूड वेस्ट इंडेक्स रिपोर्ट के अनुसार हर साल लगभग 1 अरब टन भोजन बर्बाद हो रहा है, जिसमें करीब 60 प्रतिशत हिस्सा केवल घरेलू स्तर से आता है।

यूएनईपी आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में उत्पादित कुल भोजन का लगभग पांचवां हिस्सा बर्बाद हो जाता है। इसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी घरों की है। रेस्टोरेंट, होटल और खुदरा क्षेत्र भी इसमें योगदान देते हैं। लेकिन रिपोर्ट के अनुसार बर्बादी का केंद्र घरेलू स्तर ही है, जो इस संकट को गहरा बना रहा है। रिपोर्ट के अनुसार अगर कचरा प्रबंधन पर ध्यान नहीं दिया गया तो मनुष्य और प्रकृति को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। इससे कैंसर, दमा और सांस संबंधी बीमारियां फैलती हैं।

यह भूमिगत मिट्टी को दूषित कर खाद्य उत्पादों को प्रभावित करता है, जिसका सीधा संबंध लोगों की सेहत से है। बीते कुछ वर्षों में देखा गया है कि प्रदूषण के कारण विभिन्न प्रकार के रोगों ने जन्म लिया है। इसके बावजूद इस ओर कम से कम ध्यान दिया जा रहा है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कचरे का गलत निपटान भी पर्यावरण के लिए संकट खड़ा कर रहा है। जैविक कचरे के सड़ने से मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं, जो जलवायु परिवर्तन को तेज करती हैं।

अर्थव्यवस्था पर असर
खराब कचरा प्रबंधन का सीधा असर स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। रिपोर्टों के अनुसार इससे बीमारियों का खतरा बढ़ता है, जमीन की गुणवत्ता प्रभावित होती है। पर्यटन और कृषि क्षेत्र को नुकसान पहुंचता है और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि कचरा प्रबंधन पर निवेश को खर्च नहीं बल्कि दीर्घकालिक बचाव के रूप में देखा जाना चाहिए। िश्व बैंक के मुताबिक कम आय वाले देशों में कचरा प्रबंधन की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है। तेजी से बढ़ती आबादी के साथ कचरे की मात्रा बढ़ रही है, लेकिन उसे संभालने के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा नहीं है। रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि अगले 25 वर्षों में इन देशों को कचरा प्रबंधन सुधारने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता होगी।

नीतियों के साथ व्यक्तिगत जिम्मेदारी समझना जरूरी
यूएनईपी और विश्व बैंक दोनों ही इस बात पर जोर देते हैं कि इस संकट से निपटने के लिए बहु-स्तरीय प्रयास जरूरी हैं। जहां सरकारों को कचरा प्रबंधन के ढांचे में निवेश बढ़ाने और प्रभावी नीतियां लागू करने की जरूरत है, वहीं आम लोगों को भी भोजन की बर्बादी कम करने, जरूरत के अनुसार उपभोग करने और कचरे के सही पृथक्करण व पुनर्चक्रण की आदत अपनानी होगी। रिपोर्टों के संकेत स्पष्ट हैं, अगर मौजूदा रुझान नहीं बदले तो आने वाले दशकों में कचरे का संकट वैश्विक स्तर पर और भी गंभीर रूप ले सकता है।

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