सतलुज का सियासत और बवाल से है पुराना रिश्ता, क्या है 60 साल से अनसुलझे एक और विवाद की पूरी कहानी?

सतलुज का सियासत और बवाल से है पुराना रिश्ता, क्या है 60 साल से अनसुलझे एक और विवाद की पूरी कहानी?

फिल्म सतलुज के चर्चा में आने के साथ ही इस नदी से जुड़े दशकों पुराने विवाद भी फिर सुर्खियों में हैं। सतलुज-यमुना लिंक (SYL) नहर विवाद पिछले करीब 60 वर्षों से पंजाब और हरियाणा के बीच सबसे बड़े अंतरराज्यीय जल विवादों में बना हुआ है। आखिर यह विवाद शुरू कैसे हुआ और इतने वर्षों बाद भी इसका समाधान क्यों नहीं निकल सका? आइए विस्तार से जानते हैं। 

अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज इन दिनों चर्चा में है, लेकिन रिलीज के महज दो दिन बाद ही इसे भारत में प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। हालांकि, फिल्म अन्य देशों के दर्शकों के लिए अब भी उपलब्ध है। फिल्म एक ऐसे दौर की कहानी दिखाती है, जब पंजाब में हजारों लोगों के कथित तौर पर लापता होने और फर्जी मुठभेड़ों में मारे जाने के आरोप लगे थे। 

सतलुज फिल्म से चर्चा में आई सतलुज पंजाब-हरियाणा के लिए बेहद अहम रही है। इस नदी का विवादों से भी लंबा संबंध रहा है। ताजा विवाद का भी अपना एक इतिहास है। एक विवाद ऐसे भी है जिसने सत्ता तक बदली लेकिन वो आज तक नहीं सुलझा है।

क्या है सतलुज को लेकर ताजा विवाद?

फिल्म ‘सतलुज’ 3 जुलाई को ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 पर रिलीज हुई। हालांकि, रिलीज के महज दो दिन बाद, 5 जुलाई को फिल्म को भारत में प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। फिल्म को सीबीएफसी का सर्टिफिकेट नहीं लेने के कारण यह कदम उठाया गया। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर फिल्म सतलुज के रिलीज होने के बाद इसके निर्देशक हनी त्रेहन ने कहा था कि इस फिल्म में कोई कांट-छांट नहीं की गई है और न ही इसके मूल स्वरूप से कोई समझौता किया गया है।

इस फिल्म का मूल नाम ‘पंजाब 95’ था। अलग-अलग कारणों से इसकी रिलीज लंबे समय तक टलती रही। पहले इसे 7 फरवरी 2025 को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिलीज करने की घोषणा की गई थी और इसका टीजर भी जारी किया गया था, लेकिन बाद में रिलीज फिर स्थगित कर दी गई। फिल्म में दिलजीत दोसांझ, अर्जुन रामपाल, सुविंदर विक्की, जगजीत संधू और गीतिका विद्या ओहल्यान ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई हैं।

सेंसर बोर्ड को लेकर क्या बोले निर्देशक?

मार्च 2025 में बीबीसी पंजाबी को दिए एक इंटरव्यू में निर्देशक हनी त्रेहन ने बताया था कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने शुरुआत में फिल्म में 21 कट लगाने को कहा था। बाद में यह संख्या बढ़कर 120 से अधिक हो गई।

त्रेहन ने कहा था कि कई कट ऐसे थे, जिनका कोई स्पष्ट कारण भी नहीं बताया गया। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनसे फिल्म से जसवंत सिंह खालड़ा का नाम हटाने तक को कहा गया था। उनके अनुसार, यह स्वीकार करना संभव नहीं था क्योंकि फिल्म पूरी तरह खालड़ा के जीवन और संघर्ष पर आधारित है।

फिल्म के मुख्य कलाकार दिलजीत दोसांझ ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इस ‘शैडो बैन’ की तुलना खालरा के गायब होने और उनकी हत्या से की। उन्होंने कहा कि फिल्म लोगों तक पहुंच चुकी है। उनका जो मकसद था वह पूरा हो गया है। अब बैन करने का कोई फायदा नहीं है।

फिल्म की कहानी किस पर आधारित है?

फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन और उनके संघर्ष पर आधारित है। खालड़ा ने 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में कथित फर्जी मुठभेड़ों और लापता हुए हजारों सिख युवाओं के मामलों को दस्तावेजों के आधार पर उजागर कर राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा। बाद में वे शिरोमणि अकाली दल के मानवाधिकार प्रकोष्ठ के महासचिव बने। 6 सितंबर 1995 को उन्हें कथित तौर पर अमृतसर स्थित उनके घर से अगवा कर लिया गया। आरोप है कि पुलिस हिरासत में यातनाएं देने के बाद उनकी हत्या कर शव को हरिके पुल के पास सतलुज नदी में फेंक दिया गया। हालांकि सतलुज को लेकर यह विवाद नया नहीं है,  सतलुज-यमुना लिंक (SYL) नहर विवाद पंजाब और हरियाणा के बीच कई दशकों से चला आ रहा सबसे बड़े अंतरराज्यीय जल विवादों में से एक है। आइए इसकी पृष्ठभूमि के बारे में भी जानते हैं।

1960: सिंधु जल संधि
भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि हुई। इसके तहत भारत को रावी, ब्यास और सतलुज नदियों के पानी के उपयोग का पूरा अधिकार मिला।

1966: हरियाणा का गठन और विवाद की शुरुआत
पंजाब के विभाजन के बाद हरियाणा राज्य बना। इसके बाद सवाल उठा कि रावी और ब्यास के पानी में हरियाणा का हिस्सा कैसे मिले। इसी उद्देश्य से सतलुज-यमुना लिंक (SYL) नहर बनाने की योजना बनाई गई, ताकि सतलुज का पानी हरियाणा तक पहुंच सके। हालांकि, पंजाब ने इसका विरोध किया। उसका कहना था कि ‘रिपेरियन सिद्धांत’ के अनुसार किसी नदी का पानी उसी राज्य का होता है, जहां से वह नदी बहती है।

1981: पानी के बंटवारे पर समझौता
केंद्र सरकार की मध्यस्थता में पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के बीच नदी के पानी के बंटवारे पर नया समझौता हुआ और दोनों राज्यों ने पानी के पुनर्वितरण पर सहमति जताई।

1982: एसवाईएल नहर का निर्माण शुरू
पंजाब के कपूरी गांव से 214 किलोमीटर लंबी एसवाईएल नहर का निर्माण शुरू हुआ। इसमें से 122 किलोमीटर हिस्सा पंजाब में और 92 किलोमीटर हिस्सा हरियाणा में पड़ता है। लेकिन पंजाब में इसका जबरदस्त विरोध हुआ। आंदोलन, प्रदर्शन और हिंसा बढ़ी, जिससे यह मुद्दा कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ गया।

1985: राजीव-लोंगोवाल समझौता
तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और अकाली दल के नेता संत हरचंद सिंह लोंगोवाल के बीच समझौता हुआ।
इसके तहत नदी के पानी का दोबारा आकलन करने के लिए ट्रिब्यूनल बनाया गया।

1987: ट्रिब्यूनल की सिफारिश
ट्रिब्यूनल ने पंजाब का हिस्सा पांच एमएएफ (मिलियन एकड़ फीट) और हरियाणा का हिस्सा 3.83 एमएएफ तय करने की सिफारिश की।

1996: मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा
हरियाणा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की कि पंजाब को अपने हिस्से में एसवाईएल नहर का निर्माण पूरा करने का निर्देश दिया जाए।

2002 और 2004: सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार को अपने क्षेत्र में नहर निर्माण पूरा करने का निर्देश दिया।

2004: पंजाब ने समझौता खत्म किया
पंजाब विधानसभा ने पंजाब समझौता समाप्ति अधिनियम, 2004 पारित कर सभी पुराने जल बंटवारा समझौतों को समाप्त कर दिया। इससे एसवाईएल नहर परियोजना लगभग ठप हो गई।

2016: सुप्रीम कोर्ट ने कानून को असंवैधानिक बताया
राष्ट्रपति के संदर्भ (अनुच्छेद 143) पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पंजाब एकतरफा तरीके से समझौते से पीछे नहीं हट सकता। अदालत ने 2004 के कानून को संवैधानिक रूप से अमान्य करार दिया।

2020: बातचीत से समाधान की कोशिश
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों को केंद्र सरकार की मध्यस्थता में बातचीत कर विवाद सुलझाने का निर्देश दिया।

2021-2026: पंजाब पानी की कमी और पर्यावरणीय चिंताओं का हवाला देते हुए एसवाईएल नहर के निर्माण का लगातार विरोध कर रहा है।

एसवाईएल नहर पर पंजाब का पक्ष क्या है?

  • पंजाब सरकार का कहना है कि राज्य के पास अब हरियाणा के साथ बांटने के लिए पर्याप्त नदी का पानी नहीं बचा है।
  • लगातार भूजल दोहन के कारण पंजाब गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है।
  • एसवाईएल नहर बनने से पंजाब के किसानों और खेती पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
  • पंजाब समझौता समाप्ति अधिनियम, 2004  के तहत राज्य पहले हुए जल बंटवारे के समझौतों को समाप्त कर चुका है।
  • सरकार का यह भी तर्क है कि मौजूदा पर्यावरणीय परिस्थितियों में इस परियोजना को पूरा करना व्यावहारिक और टिकाऊ नहीं है।

हरियाणा का पक्ष क्या है?

  • हरियाणा सरकार का कहना है कि उसे कानूनी समझौतों के अनुसार रावी और ब्यास के पानी में अपना तय हिस्सा मिलना चाहिए।
  • सुप्रीम कोर्ट कई बार पंजाब को नहर निर्माण पूरा करने का निर्देश दे चुका है, इसलिए इन आदेशों का पालन होना चाहिए।
  • एसवाईएल नहर पूरी होने से हरियाणा के कई जिलों में सिंचाई और पीने के पानी की समस्या दूर होगी।
  • हरियाणा का आरोप है कि पंजाब का नहर निर्माण से इनकार करना संविधान और अंतरराज्यीय जल समझौतों का उल्लंघन है।

Why the Satluj River Has Been at the Centre of Politics and Conflict for Decades

क्या इस तरह के जल विवाद दूसरे राज्यों में भी हैं?

कावेरी नदी विवाद: यह विवाद कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के बीच कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) पानी के बंटवारे की निगरानी करता है।

कृष्णा नदी विवाद: महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के बीच कृष्णा नदी के पानी के उपयोग और बंटवारे को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। इसके समाधान के लिए ट्रिब्यूनल का गठन किया गया, लेकिन कई मुद्दों पर अब भी मतभेद हैं।

महानदी नदी विवाद: ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच महानदी पर बने बांधों से पानी छोड़े जाने और पानी के बंटवारे को लेकर विवाद है। इस मामले की जांच के लिए 2018 में महानदी जल विवाद ट्रिब्यूनल बनाया गया था।

गोदावरी नदी विवाद: महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और अन्य राज्यों के बीच गोदावरी के पानी के बंटवारे को लेकर विवाद हुआ था। ट्रिब्यूनल के फैसलों और राज्यों के बीच समझौतों के बाद अधिकांश विवाद सुलझ चुके हैं।

महादयी नदी विवाद: यह विवाद कर्नाटक, गोवा और महाराष्ट्र के बीच है। मुख्य मुद्दा महादयी नदी के पानी को दूसरी जगह मोड़ने की योजना है। ट्रिब्यूनल के फैसले के बाद भी राज्यों के बीच मतभेद बने हुए हैं।

नर्मदा नदी विवाद: मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच नर्मदा नदी के पानी के बंटवारे और बांध परियोजनाओं को लेकर विवाद था। करीब नौ साल बाद नर्मदा जल विवाद ट्रिब्यूनल के फैसले से इसका समाधान हुआ।

वंशधारा नदी विवाद: यह विवाद आंध्र प्रदेश और ओडिशा के बीच वंशधारा नदी पर बांध की ऊंचाई और पानी के बंटवारे को लेकर है। इस मामले में ट्रिब्यूनल और अदालत दोनों की भूमिका रही है।

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