दिग्गजों का सुझाव: बीटेक 5 साल का हो, विद्यार्थी को मिले अपनी रफ्तार से पढ़ने का मौका; विषय चुनने की आजादी अहम

दिग्गजों का सुझाव: बीटेक 5 साल का हो, विद्यार्थी को मिले अपनी रफ्तार से पढ़ने का मौका; विषय चुनने की आजादी अहम

आईआईटी में पढ़ाई के दबाव और छात्रों की मानसिक सेहत को देखते हुए बीटेक को चार के बजाय पांच साल करने का सुझाव दिया गया है। प्रस्ताव है कि तेज विद्यार्थी जल्दी डिग्री ले सकें और जिन्हें ज्यादा समय चाहिए, उन्हें पांच साल तक पढ़ने का मौका मिले। लेकिन क्या सिर्फ पढ़ाई की अवधि बढ़ाने से समस्या हल होगी? क्या आईआईटी में हर विद्यार्थी को अपनी गति से पढ़ने की आजादी मिलनी चाहिए? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं…

आईआईटी में पढ़ाई के दबाव और छात्रों की मानसिक सेहत को लेकर एक बार फिर पढ़ाई के मौजूदा तरीके पर सवाल उठे हैं। ग्लोबल आईआईटी एलुमनाई सपोर्ट ग्रुप के मुताबिक, 2006 से सितंबर 2026 के बीच आईआईटी के 171 छात्रों की असमय मौत हुई। इनमें 140 ने खुदकुशी की। आंकड़ों के बीच आईआईटी के वरिष्ठ शिक्षाविदों ने बीटेक की पढ़ाई चार के बजाय पांच साल करने का सुझाव दिया है। उनका कहना है कि हर विद्यार्थी की सीखने की क्षमता और रफ्तार अलग होती है, इसलिए सभी को एक जैसी गति से पढ़ाने के बजाय लचीली व्यवस्था बनानी चाहिए।

आईआईटी में बीटेक की अवधि पांच साल करने का सुझाव क्यों दिया गया?
वरिष्ठ शिक्षाविदों का कहना है कि पांच साल की अवधि रखने से विद्यार्थियों पर पढ़ाई पूरी करने का एक जैसा दबाव कम किया जा सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं होगा कि हर विद्यार्थी को पांच साल ही पढ़ना पड़े। जो विद्यार्थी जरूरी क्रेडिट और दूसरी अकादमिक जरूरतें जल्दी पूरी कर लें, वे चार या साढ़े तीन साल में भी डिग्री हासिल कर सकें। वहीं जिन्हें किसी विषय को समझने या क्रेडिट पूरा करने में ज्यादा समय चाहिए, उन्हें पांच साल तक पढ़ने का मौका मिले। इस व्यवस्था में विद्यार्थी को उसकी क्षमता के हिसाब से आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा।

क्या एक जैसी पढ़ाई व्यवस्था सभी विद्यार्थियों के लिए सही है?
आईआईटी में अलग-अलग शैक्षणिक और सामाजिक पृष्ठभूमि से विद्यार्थी आते हैं। किसी की तैयारी बहुत मजबूत होती है तो किसी को कुछ विषयों को समझने में ज्यादा समय लगता है। पूर्व आईआईटी दिल्ली निदेशक प्रो. वी रामगोपाल राव ने कहा कि असली सवाल यह है कि क्या आईआईटी ने विद्यार्थियों की इस विविधता के हिसाब से पढ़ाई का तरीका बदला है। उनका कहना है कि अच्छी रैंक मिलना आईआईटी में सफलता की गारंटी नहीं है। एक ही कक्षा में अलग-अलग स्तर के विद्यार्थियों को एक ही गति से पढ़ाने पर कुछ विद्यार्थी पीछे छूट सकते हैं।

तेज और धीमी गति से पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए क्या व्यवस्था हो सकती है?
प्रस्ताव के मुताबिक, विद्यार्थियों को अपनी गति से पढ़ने की सुविधा दी जानी चाहिए। जिन्हें ज्यादा समय चाहिए, उन्हें रिकॉर्ड किए गए व्याख्यान, ऑनलाइन अध्ययन सामग्री और जरूरत पड़ने पर भाषा से जुड़ी सहायता दी जा सकती है। साथ ही शुरुआत में पांच साल की अवधि सभी विद्यार्थियों के लिए समान घोषित की जाए। इससे पांचवें साल तक पढ़ाई करने वाले विद्यार्थी को अलग नजर से नहीं देखा जाएगा और उसके मन में पीछे रह जाने का भाव भी कम होगा। जो विद्यार्थी जल्दी तैयार हो जाएं, उनके लिए कम समय में डिग्री पूरी करने का रास्ता खुला रहेगा।

क्या सिर्फ बीटेक पांच साल करने से मानसिक दबाव खत्म हो जाएगा?
पूर्व एआईसीटीई अध्यक्ष प्रो. टीजी सीताराम का कहना है कि सिर्फ बीटेक की अवधि चार से पांच साल करने से सीखने और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सभी समस्याएं खत्म नहीं होंगी। उनका कहना है कि लगातार प्रतियोगिता और एक जैसी व्यवस्था में धीमी गति से सीखने वाले विद्यार्थी खुद की तुलना तेज विद्यार्थियों से करने लगते हैं। इससे बेचैनी, हीनभावना और आत्मविश्वास में कमी आ सकती है। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें हर विद्यार्थी को अपनी क्षमता और गति के हिसाब से आगे बढ़ने, सीखने और अपनी योग्यता साबित करने के कई मौके मिलें।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसका रास्ता कैसे निकल सकता है?
प्रो. सीताराम ने आगे यह भी कहा कि  राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और राष्ट्रीय क्रेडिट फ्रेमवर्क ऐसी लचीली व्यवस्था का रास्ता देते हैं। क्रेडिट आधारित प्रणाली में तेज विद्यार्थी जल्दी आगे बढ़ सकते हैं, जबकि ज्यादा समय लेने वाले विद्यार्थियों को अतिरिक्त समय, मार्गदर्शन और व्यावहारिक सहायता दी जा सकती है। इसके साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीरता से काम करना जरूरी है। यूजीसी ने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े दिशा-निर्देशों का मसौदा 2022 में जारी किया था, लेकिन दिए गए इनपुट के मुताबिक 2026 तक ये दिशा-निर्देश लागू नहीं हो पाए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2025 में शिक्षण संस्थानों के लिए मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े अंतरिम दिशा-निर्देश जारी किए थे।

माता-पिता को बच्चों में किन बदलावों को गंभीरता से लेना चाहिए?
बच्चा अचानक चुप रहने लगे, परिवार या दोस्तों से दूरी बनाने लगे, उसकी नींद या भूख में बड़ा बदलाव आए या पढ़ाई और पसंदीदा कामों में उसकी रुचि खत्म हो जाए तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अगर बच्चा निराशा की बात करे या खुद को परिवार पर बोझ बताए तो उसकी बात ध्यान से सुनना जरूरी है। उसे डांटने, रोकने या दूसरे बच्चों से तुलना करने के बजाय उसकी परेशानी समझने की कोशिश करनी चाहिए। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, पिछले तीन वर्षों में 43 आईआईटी छात्रों ने जान गंवाई। इनमें 82-85 मामले परिसर के भीतर और परीक्षा व परिणाम के दिनों में सबसे ज्यादा रहने की बात कही गई है।

मदद के लिए उपलब्ध हेल्पलाइन: अगर कोई व्यक्ति मानसिक तनाव या निराशा से गुजर रहा है तो केंद्र सरकार की टेली मानस हेल्पलाइन 14416 या 1800 891 4416 पर चौबीसों घंटे मुफ्त और गोपनीय मदद ली जा सकती है। मदद मांगना कमजोरी नहीं है।

administrator

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *