जनगणना की अधिसूचना ने दी नई बहस को हवा; अगले आम चुनाव तक कैसे बढ़ेंगी लोकसभा की सीटें?

जनगणना की अधिसूचना ने दी नई बहस को हवा; अगले आम चुनाव तक कैसे बढ़ेंगी लोकसभा की सीटें?

गृह मंत्रालय ने 2027 में होने वाली जनगणना की अधिसूचना जारी कर दी है…हालांकि अधिसूचना के समय ने राजनीतिक बहस को हवा दे दी है, क्योंकि निर्वाचन क्षेत्रों के भविष्य के परिसीमन और संसदीय सीट वितरण पर इसका असर पड़ सकता है। सबसे अधिक माथापच्ची सीटें बढ़ाने के फॉर्मूले पर होगी।

सरकार की ओर से जनगणना के लिए अधिसूचना जारी होने के साथ ही परिसीमन और महिला आरक्षण कानून लागू करने पर नए सिरे से चर्चा शुरू हो गई है। दरअसल, इसी जनगणना के आधार पर परिसीमन होगा। इसी आधार पर लोकसभा के साथ राज्यों के विधानसभाओं की सीटों की संख्या बढ़ेगी। सरकार ने परिसीमन के बाद ही संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने वाला कानून लागू करने की घोषणा कर रखी है। मगर, समय के अभाव में इसके लिए 2034 के आम चुनाव तक का इंतजार करना पड़ सकता है।

दरअसल, अधिसूचना के मुताबिक एक मार्च, 2027 से जनगणना की प्रक्रिया शुरू होगी। इसका प्राथमिक डाटा तो आने लगेगा, मगर विस्तृत डाटा के लिए लंबी माथापच्ची करनी होगी। ऐसे में अंतिम आंकड़ा दिसंबर, 2027 से पहले संभव नहीं है। अंतिम आंकड़ा आने से पहले सरकार परिसीमन आयोग का गठन नहीं कर सकती। यानी, नए परिसीमन आयोग का गठन साल 2028 में होगा। सामान्य परिस्थिति में परिसीमन को अंतिम रूप देने में कम से कम एक साल का समय लगता है। ऐसे में आयोग साल 2028 के अंत में या चुनावी वर्ष 2029 की शुरुआत में ही अपनी रिपोर्ट पेश कर सकता है। ऐसे में सरकार के पास रिपोर्ट की सिफारिशें लागू करने के लिए महज दो से तीन महीने का ही समय होगा।

1973 में 543 हुई थी लोकसभा सीटों की संख्या

  •  देश में परिसीमन के आधार पर अब तक तीन बार लोकसभा के सीटों की संख्या बढ़ाई गई।
  •  पहला परिसीमन 1951 की जनगणना के आधार पर 1952 में हुआ और लोकसभा के सीटों की संख्या 489 तय की गई।
  •  दूसरा परिसीमन 1961 की जनगणना और तीसरा परिसीमन 1971 की जनगणना के आधार पर 1973 में हुई। इसके आधार पर लोकसभा की सीटें क्रमश: 522 और 543 कर दी गई।  
  •  दक्षिण के राज्यों के विरोध के बाद परिसीमन पर 2001 तक रोक लगा दी गई। साल 2001 में परिसीमन तो हुआ मगर सीटों की संख्या बढ़ाने पर 25 साल तक के लिए रोक लगा दी गई।


परिसीमन विवाद का ढूंढ़ना होगा हल
परिसीमन की शुरुआत से पहले ही 70 के दशक की तरह देश में उत्तर बनाम दक्षिण का विवाद शुरू हो गया है। दक्षिण भारत के राज्य पहले की तरह जनसंख्या के आधार पर सीटों की संख्या बढ़ाने के फॉर्मूले का विरोध कर रहे हैं। द्रमुक, कांग्रेस समेत दक्षिण के राज्यों के मुखर विरोध के बीच सरकार की सबसे अहम सहयोगी तेदेपा ने भी मांग की है कि सीटों की बढ़ोतरी जनसंख्या के आधार पर न होकर आनुपातिक हो। मसलन सीटों की बढ़ोतरी का सभी राज्यों को समान लाभ हो। जाहिर तौर पर परिसीमन से पहले सरकार को इस विवाद का निपटारा करना होगा। गौरतलब है कि इसी विवाद के कारण 1973 में हुए परिसीमन के आधार पर लोकसभा की सीटें बढ़ाने के बाद इसे टाला जाता रहा।

जातियों का प्रामाणिक आंकड़ा भी निकालना मुश्किल
सरकार ने आजादी के बाद पहली बार जाति गणना की घोषणा की है, मगर सटीक आंकड़ा निकालना टेढ़ी खीर है। 2011 की जनगणना में सर्वे के जरिए इस आशय की कोशिश की गई थी, हालांकि तब 38 लाख जातियां और उपजातियां सामने आई थी। सरकार ने इस बार हर धर्म के जाति का आंकड़ा जुटाने की घोषणा की है। हालांकि सटीक आंकड़ा कैसे सामने आएगा, इस पर फिलहाल कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।

administrator

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *