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	<title>Health &#8211; RNSNS News</title>
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	<title>Health &#8211; RNSNS News</title>
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		<title>आईसीएमआर: अब लक्षण देखकर नहीं संक्रमण के आधार पर होगा रोगी का इलाज, 233 कीटाणुओं की सूची तैयार, क्या है योजना?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[RNSNS]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 Sep 2026 04:32:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Health]]></category>
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					<description><![CDATA[आईसीएमआर ने चार संक्रमण के लिए तैयार की 233 तरह के कीटाणुओं की सूची। अब लक्षण देखकर नहीं संक्रमण के आधार पर होगा रोगी का इलाज। बुखार के साथ बेहोशी या दौरा पड़ने पर मामला गंभीर माना जाएगा। अब बुखार, खांसी, दस्त या सांस लेने की तकलीफ में सिर्फ लक्षण देखकर दवा देने का तरीका [&#8230;]]]></description>
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<p class="wp-block-paragraph">आईसीएमआर ने चार संक्रमण के लिए तैयार की 233 तरह के कीटाणुओं की सूची। अब लक्षण देखकर नहीं संक्रमण के आधार पर होगा रोगी का इलाज। बुखार के साथ बेहोशी या दौरा पड़ने पर मामला गंभीर माना जाएगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अब बुखार, खांसी, दस्त या सांस लेने की तकलीफ में सिर्फ लक्षण देखकर दवा देने का तरीका बदल सकता है। डॉक्टर पहले यह पता लगाने पर जोर देंगे कि बीमारी के पीछे कौन सा वायरस, बैक्टीरिया या परजीवी है। इसके बाद इलाज उसी संक्रमण को ध्यान में रखकर किया जाएगा। इससे मरीज बेवजह की दवाओं, एंटीबायोटिक के सेवन से बच जाएंगे। इसका सबसे ज्यादा बुरा असर लोगों की सेहत पर पड़ रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने संक्रमण की जांच के लिए एक नई प्राथमिकता सूची तैयार की है। इसमें बताया गया है कि मरीज के लक्षण देखकर किस संक्रमण की जांच पहले करनी चाहिए। आईसीएमआर ने ये सूची देशभर के नामचीन डॉक्टर्स, लैब एक्सपर्ट्स और महामारी विशेषज्ञों के साथ 44 बैठकों में चर्चा और भारत तथा समान परिस्थितियों वाले देशों में हुए शोध की समीक्षा के बाद तैयार की है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>बुखार में पहले मलेरिया-डेंगू, खांसी में फ्लू-कोरोना, दस्त में ई-कोलाई-हैजा की तलाश</strong><br>आईसीएमआर की सूची का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अचानक बिना स्पष्ट कारण आने वाला बुखार है। इसमें 38 डिग्री से ज्यादा तापमान और 14 दिन या उससे कम समय का बुखार शामिल है। ऐसे मरीज में प्राथमिकता 1ए में मलेरिया के परजीवी, डेंगू वायरस, टाइफाइड और पैराटाइफाइड के बैक्टीरिया, स्क्रब टाइफस, फ्लू वायरस, लेप्टोस्पाइरा, चिकनगुनिया, ब्रुसेला और चांदीपुरा वायरस रखे गए हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>कैसे तय करेंगे प्राथमिकता?</strong><br>बुखार के साथ शरीर पर दाने निकलें तो जांच की दिशा बदल जाएगी। इसमें खसरा, रूबेला, स्क्रब टाइफस और दूसरे रिकेट्सियल संक्रमण, डेंगू, चिकनपॉक्स से जुड़ा वायरस, हर्पीज, हाथ-पैर-मुंह की बीमारी वाला एंटरोवायरस और जीका जैसे संक्रमणों को प्राथमिकता दी गई है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>किन&nbsp;संक्रमणों को पहले देखा जाएगा?</strong><br>अगर बुखार के साथ गर्दन या दूसरी जगह गांठें यानी लसीका ग्रंथियां बढ़ी हुई हों, तो एपस्टीन-बार वायरस, साइटोमेगालोवायरस, स्क्रब टाइफस, ब्रुसेला, मेलियोइडोसिस से जुड़ा बैक्टीरिया, रिकेट्सियल संक्रमण और टीबी जैसे कारणों को देखा जाएगा। अगर बुखार के साथ खांसी और सांस की तकलीफ भी है और लक्षण 10 दिन के भीतर शुरू हुए हैं, तो फ्लू, कोरोना, आरएसवी, रेस्पिरेटरी वायरस, मेटान्यूमोवायरस और एडेनोवायरस जैसे संक्रमणों को पहले देखा जाएगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>बुखार के साथ बेहोशी या दौरा पड़े तो मामला गंभीर</strong><br>आईसीएमआर ने अचानक दिमागी संक्रमण जैसे लक्षणों के लिए भी अलग प्राथमिकता तय की है। इसमें सात दिन या उससे कम समय से बुखार के साथ भ्रम, पहचानने-समझने में परेशानी, बेहोशी या बोलने में असमर्थता और नया दौरा पड़ना शामिल है। ऐसे मामलों में जापानी इंसेफेलाइटिस, मलेरिया, स्क्रब टाइफस और रिकेट्सियल संक्रमण को प्राथमिकता दी गई है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वायरस का संदेह होने पर हर्पीज, डेंगू, चिकनगुनिया, एंटरोवायरस, वेस्ट नाइल, निपाह और दूसरे वायरस भी जांच में लिए जा सकते हैं। आईसीएमआर ने इन रोगजनकों को 1ए, 1बी, 2 और 3 जैसी प्राथमिकताओं में रखा है। 1ए में वे संक्रमण हैं जिनकी पहचान इलाज शुरू करने से पहले महत्वपूर्ण मानी गई है। आगे की श्रेणियों में कम आम, दुर्लभ या विशेष निगरानी में मिलने वाले रोगजनक आते हैं।<br><br></p>



<p class="wp-block-paragraph"><a href="https://www.amarujala.com/user/himanshu-mishra-election" target="_blank" rel="noopener"></a></p>
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		<title>स्वाइन फ्लू : दिल्ली में 2308 मरीज, नोएडा में 24 घंटे में बढ़े आठ गुना केस; एनसीआर के अस्पताल अलर्ट मोड में</title>
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		<dc:creator><![CDATA[RNSNS]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 26 Aug 2026 03:58:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Health]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi]]></category>
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					<description><![CDATA[दिल्ली में बीमारी के मामले बढ़कर 2,308 व इन्फ्लुएंजा ए+बी के 3,000 हो गए हैं। वहीं, गौतमबुद्ध नगर जिले में मंगलवार को एक ही दिन में 105 नए मामले सामने आने से हड़कंप मच गया।   दिल्ली-एनसीआर में स्वाइन फ्लू के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। दिल्ली में बीमारी के मामले बढ़कर 2,308 व इन्फ्लुएंजा ए+बी के 3,000 [&#8230;]]]></description>
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<p class="wp-block-paragraph">दिल्ली में बीमारी के मामले बढ़कर 2,308 व इन्फ्लुएंजा ए+बी के 3,000 हो गए हैं। वहीं, गौतमबुद्ध नगर जिले में मंगलवार को एक ही दिन में 105 नए मामले सामने आने से हड़कंप मच गया।  <br><br>दिल्ली-एनसीआर में स्वाइन फ्लू के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। दिल्ली में बीमारी के मामले बढ़कर 2,308 व इन्फ्लुएंजा ए+बी के 3,000 हो गए हैं। वहीं, गौतमबुद्ध नगर जिले में मंगलवार को एक ही दिन में 105 नए मामले सामने आने से हड़कंप मच गया।  </p>



<p class="wp-block-paragraph">राजधानी में मौसमी फ्लू और वेक्टर जनित बीमारियों के बढ़ते मामलों को लेकर स्वास्थ्य मंत्री डॉ. पंकज कुमार सिंह ने अंतर-विभागीय समीक्षा बैठक के बाद कहा कि सभी अस्पताल अलर्ट पर हैं। उन्होंने बताया कि इस वर्ष एच1एन1 प्रमुख सबटाइप हैं, जबकि पिछले साल एच3एन2 थे। वहीं, डेंगू के 570 और मलेरिया के 215 केस मिले हैं। राहत की बात है कि डेंगू-मलेरिया से इस साल कोई मौत नहीं हुई है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>जमीनी स्तर पर दिखे काम, सिर्फ रिपोर्ट में नहीं</strong><br>स्वास्थ्य मंत्री ने अस्पतालों की तैयारी, सर्विलांस, दवाओं और टेस्टिंग सुविधाओं की समीक्षा की। कहा, तैयारियां सिर्फ रिपोर्ट और आंकड़ों तक सीमित न रहें, असर जमीन पर दिखना चाहिए। पिछले हफ्ते केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा के साथ बैठक में केंद्र सरकार ने पूरा सहयोग का आश्वासन दिया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">स्वास्थ्य मंत्री ने कहा, केंद्र की एडवाइजरी सभी अस्पतालों और विभागों को भेज दी गई है। एएलआई/एचएआरआई सर्विलांस को और मजबूत किया जाएगा। मामलों की जल्द पहचान, समय पर रिपोर्टिंग और एंटीवायरल दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी।&nbsp;</p>



<ul class="wp-block-list">
<li>डेंगू-मलेरिया नियंत्रण के लिए स्प्रेइंग और फॉगिंग तेज करने को कहा गया है। </li>
</ul>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>नोएडा- 24 घंटे में आठ गुना बढ़े मरीज</strong><br>गौतमबुद्ध नगर जिले में स्वाइन फ्लू के मरीजों की संख्या सिर्फ 24 घंटे आठ गुना बढ़कर 120 पहुंच गई। सोमवार तक जिले में सिर्फ 15 मरीज थे। मरीजों की संख्या में तेज वृदि्ध को देखते हुए सख्त गाइडलाइन जारी की गई है।&nbsp;</p>



<ul class="wp-block-list">
<li>मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) डॉ. मदन मोहन मणि त्रिपाठी के मुताबिक, मंगलवार को आए सभी मामलों की जांच निजी अस्पतालों में कराई गई है।</li>
</ul>



<p class="wp-block-paragraph">मुख्य चिकित्सा अधिकारी के मुताबिक, स्वाइन फ्लू के लिए विशेष लैब नहीं होने से पीजीआई में जांच की जा रही है। जिला अस्पताल में लगातार मरीजों की संख्या बढ़ रही है।&nbsp;</p>



<ul class="wp-block-list">
<li>स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि जांच महंगी होने के कारण सभी संदिग्ध मरीजों की जांच नहीं हो पा रही है। इससे वास्तविक संक्रमितों की संख्या सामने आने में अंतर दिख सकता है। विभाग ने समस्या होने पर डॉक्टर से सलाह लेने की अपील की है।</li>
</ul>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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		<title>केमिकल से तैयार हो रहा पनीर और खोआ, पाम ऑयल से घी; जानें असली &#8216;माल&#8217; की पहचान करने के चार तरीके</title>
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		<dc:creator><![CDATA[RNSNS]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 18 Aug 2026 04:43:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Health]]></category>
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					<description><![CDATA[आगरा में पनीर, खोआ और घी के 96 नमूनों में 57 फेल मिले, जबकि 23 में नकली होने की पुष्टि हुई है। पनीर-खोआ में स्टार्च और रिफाइंड से लेकर घी में पाम ऑयल तक मिलाए जाने का खुलासा हुआ है, जानिए घर पर असली-नकली पहचानने के चार तरीके। घी, पनीर और खोआ सबसे ज्यादा मिलावटी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">आगरा में पनीर, खोआ और घी के 96 नमूनों में 57 फेल मिले, जबकि 23 में नकली होने की पुष्टि हुई है। पनीर-खोआ में स्टार्च और रिफाइंड से लेकर घी में पाम ऑयल तक मिलाए जाने का खुलासा हुआ है, जानिए घर पर असली-नकली पहचानने के चार तरीके।<br><br>घी, पनीर और खोआ सबसे ज्यादा मिलावटी और नकली हैं। इनके 60 फीसदी नमूने फेल हुए। ऐसे आंकड़ों को देख मुख्यमंत्री ने एनालॉग डेयरी उत्पादों को प्रतिबंधित (बैन) कर दिया है। इनकी बिक्री रोकने के लिए खाद्य विभाग जांच तेज कर रहा है। पुष्टि होने पर संचालक पर प्राथमिकी दर्ज होगी। ब्रांड भी प्रतिबंधित किया जाएगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">खाद्य विभाग को बीते दिनों खोआ, पनीर और घी के 96 नमूनों की रिपोर्ट प्राप्त हुई। इनमें से 57 नमूने फेल पाए गए। इनमें से 23 नमूनों में नकली की पुष्टि हुई। दूध की बात करें तो 111 नमूनों की रिपोर्ट में से 81 मिलावटी और नकली पाए गए। जांच में घी में पाम ऑयल, वनस्पति तेल, एसेंस और पनीर-खोआ में स्टार्च, रिफाइंड, स्किम्ड मिल्क पाउडर पाया गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मुख्यमंत्री की सख्ती के बाद खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन की आयुक्त डॉ. रोशन जैकब ने जांच में एनालॉग की पुष्टि होने पर फर्म का लाइसेंस निरस्त करने, प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए कहा है। पूरे प्रदेश में ब्रांड के उत्पाद भी बैन किए जाएंगे। सहायक आयुक्त खाद्य द्वितीय महेंद्र श्रीवास्तव ने बताया कि एनालॉग डेयरी उत्पादों की जांच करने के लिए टीम को सक्रिय किया है। नमूने में पुष्टि होने पर कार्रवाई करते हुए शासन को भी रिपोर्ट भेजी जाएगी।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>क्या होता है एनालॉग डेयरी उत्पाद</strong><br>मुख्य खाद्य सुरक्षा अधिकारी राजेश गुप्ता ने बताया कि एनालॉग कृत्रिम डेयरी उत्पाद होते हैं। इनको शुद्ध दूध से तैयार नहीं किया जाता है। इन सामग्री में दूध की वसा और प्रोटीन नहीं होती है। इसके स्थान पर पाम ऑयल, स्टार्च, सोया प्रोटीन और इमल्सीफायर (एक ऐसा पदार्थ है जो दो ऐसे तत्वों या तरल पदार्थों को आपस में मिलने और जुड़े रहने में मदद करता है जो आमतौर पर एक-दूसरे में नहीं मिलते) का उपयोग कर बनाया जाता है। इनमें पोषक तत्वों की कमी होती है और इनके खाने से पेट रोग, मधुमेह, कोलेस्ट्रॉल, हृदय रोग का खतरा अधिक होता है।</p>



<h3 class="wp-block-heading"></h3>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>ये है स्थिति</strong><br>सामग्री &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; नमूने &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; फेल &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; नकली<br>खोआ &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 28 &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 18 &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 05</p>



<p class="wp-block-paragraph">पनीर &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 51 &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 33 &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 14<br>घी &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 17 &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 06 &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 04</p>



<h3 class="wp-block-heading"></h3>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>इन नंबरों पर करें शिकायत</strong><br>टोल फ्री नंबर 18001805533,<br>खाद्य विभाग कार्यालय: 0562-29700049 (सुबह 10 से शाम 5 बजे तक)</p>



<h3 class="wp-block-heading"></h3>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>असली-नकली पनीर का पता लगाने के तरीके ये हैं:-</strong><br><strong>नंबर 1</strong><br>जब आप दुकान से पनीर खरीदें या पनीर घर ला चुके हैं तो आप पनीर को हाथ से मसल सकते हैं। ऐसे में अगर पनीर टूटकर गिर रहा है, तो यानी ये पनीर मिलावट वाला हो सकता है। ऐसे पनीर को न खरीदें, वरना ये आपकी सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है।</p>



<h3 class="wp-block-heading"></h3>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>नंबर 2</strong><br>आप जिस पनीर का सेवन कर रहे हैं वो असली है या फिर नकली है। इसका पता आप उसकी खूशबू से लगा सकते हैं। आपको करना ये है कि पनीर को सूंघना है अगर इसमें से दूध वाली खूशबू आ रही है तो ये पनीर असली होता है। जबकि, नकली पनीर में ऐसी कोई गंध नहीं आती है।</p>



<h3 class="wp-block-heading"></h3>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>नंबर 3</strong><br>पनीर को उबालकर भी आप ये जान सकते हैं कि पनीर मिलावट वाला है या असली है। आपको इसके लिए पहले पनीर को उबाल लेना है और फिर इसे निकालकर रख देना है ताकि ये ठंडा हो जाए। इसके बाद इस ठंडे पनीर के ऊपर अरहर या सोयाबीन का पाउडर डाल दें और 10 मिनट छोड़ दें। इसके बाद अगर पनीर हल्के लाल रंग का हो जाता है तो ये पनीर डिटर्जेंट से तैयार किया हुआ हो सकता है। ऐसे पनीर का सेवन बिलकुल न करें।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>नंबर 4</strong><br>मिलावट करने वाले लोग पनीर में स्टार्च मिला देते हैं। आप इसका पता लगाने के लिए पनीर के कुछ टुकड़े ले लें और फिर इन पर आयोडीन सॉल्यूशन की कुछ बूंदें डाल दें। इसके बाद अगर पनीर नीला या फिर काले रंग का हो जाता है तो ये पनीर मिलावट वाला हो सकता है। वहीं, असली पनीर का रंग नहीं बदलता है।</p>
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		<title>ओरल हाइजीन डे : स्वस्थ दांत, स्वस्थ जीवन – रूट कैनाल से दर्द का प्रभावी इलाज</title>
		<link>https://rnsnsnews.com/oral-hygiene-day-2026-healthy-teeth-healthy-life-root-canal-treatment-dr-ms-nawaz/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[RNSNS]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 01 Aug 2026 04:32:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Health]]></category>
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					<description><![CDATA[1 अगस्त ओरल हाइजीन डे के अवसर पर दंत चिकित्सक डॉ. एम.एस. नवाज ने मौखिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने की अपील करते हुए कहा कि दांत हमारे शरीर का महत्वपूर्ण अंग हैं। स्वस्थ दांत न केवल भोजन चबाने में मदद करते हैं, बल्कि सुंदर मुस्कान और संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए भी आवश्यक हैं। उन्होंने [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">1 अगस्त ओरल हाइजीन डे के अवसर पर दंत चिकित्सक <strong>डॉ. एम.एस. नवाज</strong> ने मौखिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने की अपील करते हुए कहा कि दांत हमारे शरीर का महत्वपूर्ण अंग हैं। स्वस्थ दांत न केवल भोजन चबाने में मदद करते हैं, बल्कि सुंदर मुस्कान और संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए भी आवश्यक हैं।</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full"><img data-recalc-dims="1" fetchpriority="high" decoding="async" width="213" height="241" src="https://i0.wp.com/rnsnsnews.com/wp-content/uploads/2026/08/image-1.png?resize=213%2C241&#038;ssl=1" alt="" class="wp-image-14165" title="ओरल हाइजीन डे : स्वस्थ दांत, स्वस्थ जीवन – रूट कैनाल से दर्द का प्रभावी इलाज 1"></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">उन्होंने बताया कि मुंह की सफाई में लापरवाही बरतने से दांतों की सड़न, मसूड़ों की बीमारी, मुंह से दुर्गंध और संक्रमण जैसी समस्याएं हो सकती हैं। मुंह का संक्रमण शरीर के अन्य अंगों तक पहुंचकर हृदय रोग, मधुमेह, निमोनिया, गर्भावस्था संबंधी जटिलताओं तथा अन्य गंभीर बीमारियों का जोखिम भी बढ़ा सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉ. नवाज ने बताया कि दिन में कम से कम दो बार ब्रश करना, प्रतिदिन फ्लॉस का उपयोग करना, मीठे खाद्य पदार्थों का सीमित सेवन तथा नियमित दंत जांच कराना अच्छी मौखिक स्वच्छता की पहचान है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उन्होंने कहा कि दांत में तेज दर्द होने पर बार-बार दर्द निवारक दवाएं लेना समस्या का समाधान नहीं है। ऐसे में तुरंत दंत चिकित्सक से जांच करानी चाहिए। यदि संक्रमण दांत की नस (पल्प) तक पहुंच जाता है तो <strong>रूट कैनाल ट्रीटमेंट (RCT)</strong> सबसे प्रभावी उपचार होता है, जिससे संक्रमित नस को निकालकर दांत को सुरक्षित रखा जाता है और उसे निकालने की आवश्यकता नहीं पड़ती।</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉ. मो. सबा नवाज ने बताया कि रूट कैनाल उपचार के दौरान संक्रमित हिस्से को साफ कर विशेष सामग्री से भरकर सील किया जाता है। आवश्यकता पड़ने पर दांत की मजबूती के लिए डेंटल क्राउन (कैप) लगाया जाता है। यह प्रक्रिया सुरक्षित होती है और स्थानीय एनेस्थीसिया के कारण उपचार के दौरान मरीज को दर्द महसूस नहीं होता।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उन्होंने बताया कि रूट कैनाल के बाद कुछ समय तक हल्की संवेदनशीलता सामान्य है। उपचार के बाद कठोर एवं चिपचिपे खाद्य पदार्थों से बचना, नियमित ब्रश करना, फ्लॉस का उपयोग करना तथा समय-समय पर दंत चिकित्सक से जांच कराना जरूरी है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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		<title>Stem Cell Therapy: स्टेम सेल से जगी नई उम्मीद, टाइप-1 डायबिटीज मरीजों में भी बनने लगा इंसुलिन</title>
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		<dc:creator><![CDATA[RNSNS]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Jul 2026 04:04:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वैज्ञानिकों ने टाइप-1 डायबिटीज के इलाज में बड़ी सफलता हासिल की है। उन्होंने तीन ऐसे मरीजों का सफल इलाज किया है, जिनकी इंसुलिन बनाने वाली बीटा कोशिकाएं पूरी तरह नष्ट हो चुकी थीं। इस शोध में एक मरीज को उसकी खुद की स्टेम सेल और दो मरीजों को डोनर स्टेम सेल से तैयार कोशिकाएं प्रत्यारोपित [&#8230;]]]></description>
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<p class="wp-block-paragraph">वैज्ञानिकों ने टाइप-1 डायबिटीज के इलाज में बड़ी सफलता हासिल की है। उन्होंने तीन ऐसे मरीजों का सफल इलाज किया है, जिनकी इंसुलिन बनाने वाली बीटा कोशिकाएं पूरी तरह नष्ट हो चुकी थीं। इस शोध में एक मरीज को उसकी खुद की स्टेम सेल और दो मरीजों को डोनर स्टेम सेल से तैयार कोशिकाएं प्रत्यारोपित की गईं। इलाज के बाद तीनों मरीजों के ब्लड शुगर में बड़ा सुधार देखा गया और उनके शरीर में दोबारा इंसुलिन बनने के संकेत मिले हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">टाइप-1 डायबिटीज के इलाज में वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। वैज्ञानिकों ने तीन ऐसे मरीजों का सफल इलाज किया, जिनमें इंसुलिन बनाने वाली बीटा कोशिकाएं पूरी तरह खत्म हो चुकी थीं। इनमें से एक मरीज को उसकी अपनी स्टेम सेल से तैयार इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाएं प्रत्यारोपित की गईं, जबकि दो मरीजों को डोनर स्टेम सेल से विकसित कोशिकाएं दी गईं। उपचार के बाद तीनों में ब्लड शुगर नियंत्रण में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया और मरीजों के शरीर में दोबारा इंसुलिन बनने के संकेत मिले।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>शोधकर्ताओं ने क्या-क्या कहा?</strong><br>शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन टाइप-1 डायबिटीज के इलाज की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया है कि अभी यह शुरुआती चरण का शोध है और इसे नियमित इलाज का हिस्सा बनने से पहले बड़े क्लीनिकल ट्रायल में सफल साबित करना होगा। शोध दुनिया की प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल द लैंसेट डायबिटीज एंड एंडोक्रिनोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। इस अध्ययन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि पहली बार मरीज की अपनी स्टेम सेल से तैयार इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं का सफल उपयोग एक से अधिक मरीजों के लिए किया गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अपनी कोशिकाओं का इस्तेमाल करने से भविष्य में प्रत्यारोपण के बाद शरीर द्वारा कोशिकाओं को अस्वीकार करने का खतरा कम हो सकता है। इसके साथ ही, दो मरीजों में डोनर स्टेम सेल से तैयार कोशिकाओं का भी सफल इस्तेमाल किया गया, जिससे यह तकनीक अलग-अलग परिस्थितियों में कारगर हो सकती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><br><a href="https://www.amarujala.com/user/himanshu-mishra-election" target="_blank" rel="noopener"></a></p>



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		<title>किशोरियां भी हो रहीं मेनोपॉज की शिकार, माहवारी बंद होने की उम्र घट रही; हो रहा और क्या असर?</title>
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		<pubDate>Wed, 08 Jul 2026 04:46:02 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नए अध्ययनों में सामने आया है कि समय से पहले मेनोपॉज के मामले किशोरियों में भी दर्ज हो रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक अनियमित या बंद पीरियड्स को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे भविष्य में प्रजनन क्षमता, हड्डियों और हृदय स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। मेनोपॉज यानी महिलाओं की [&#8230;]]]></description>
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<p class="wp-block-paragraph">नए अध्ययनों में सामने आया है कि समय से पहले मेनोपॉज के मामले किशोरियों में भी दर्ज हो रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक अनियमित या बंद पीरियड्स को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे भविष्य में प्रजनन क्षमता, हड्डियों और हृदय स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है।<br><br>मेनोपॉज यानी महिलाओं की माहवारी बंद होने की उम्र लगातार घट रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसे केवल 30-40 साल की महिलाओं की समस्या मानना गलत होगा। ऐसे मामले अब 13 साल तक की किशोरियों में भी सामने आने लगे हैं। किशोरियों में मेनोपॉज की बीमारी दुर्लभ भले ही हो लेकिन सही समय पर ध्यान न देने पर आगे चलकर उनकी मां बनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह चिंताजनक तस्वीर एक नए अध्ययन में सामने आई है, जिसमें बताया गया है कि किसी लड़की के पीरियड्स अगर बार-बार अनियमित हों या कई महीनों बंद रहें तो इसे केवल उम्र का असर मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यूनान की नेशनल एंड कपोडिस्ट्रियन यूनिवर्सिटी ऑफ एथेंस की डॉ. एलेनी आर्मेनी का रिव्यू अध्ययन कहता है, अगर अंडाशय समय से पहले काम करना बंद कर दें तो भविष्य में मां बनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। साथ ही हड्डियां कमजोर होने और हृदय रोग का खतरा भी बढ़ जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अमेरिका के छह बड़े चिकित्सा संस्थानों में किए गए अध्ययन में 13 से 21 वर्ष की लड़कियों में इसके मामले दर्ज किए गए। शोधकर्ताओं ने पाया, कई लड़कियों में बीमारी की पहचान देर से हुई, क्योंकि शुरुआती लक्षणों को सामान्य हार्मोनल बदलाव मान लिया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, अगर किसी किशोरी के लगातार चार या उससे महीनों तक पीरियड्स न आएं, या बार-बार अनियमित रहे, तो हार्मोन जांच के साथ जेनेटिक, ऑटोइम्यून और अन्य जरूरी परीक्षण कराए जाने चाहिए। समय पर इलाज से हड्डियों और हृदय को होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>55% तक बढ़ा हार्ट अटैक व स्ट्रोक का खतरा</strong><br>अगर किसी महिला का मेनोपॉज 40 साल की उम्र से पहले हो जाता है, तो भविष्य में उसे हार्ट अटैक, स्ट्रोक और अन्य हृदय रोगों का खतरा सामान्य महिलाओं की तुलना में काफी अधिक हो सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अध्ययन में पाया गया कि जिन महिलाओं में मेनोपॉज 50-51 वर्ष की सामान्य उम्र की बजाय 40 वर्ष से पहले हुआ, उनमें पहली बार हृदय रोग होने का खतरा 55% अधिक था। वहीं 40-44 वर्ष के बीच मेनोपॉज होने पर यह खतरा 30% और 45-49 वर्ष के बीच होने पर 12% अधिक पाया गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>महिलाओं पर हिंसा से 20 माह पहले शुरू हो सकता है मेनोपॉज</strong><br>कभी अपने जीवन में हिंसा की शिकार रही महिलाओं को मेनोपॉज के दौरान ज्यादा गंभीर लक्षणों का सामना करना पड़ता है। यही नहीं अन्य महिलाओं की तुलना में उन्हें मेनोपॉज लगभग 20 महीने पहले आ सकता है। एक अन्य अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। मैटुरिटास नामक जर्नल में प्रकाशित यह शोध दिखाता है कि महिलाओं के खिलाफ किसी भी तरह की हिंसा का असर उन्हें अधेड़ उम्र तक झेलना पड़ता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">स्पेन की यूनिवर्सिटी ऑफ ग्रेनाडा के शोधकर्ताओं के मुताबिक, हिंसा की शिकार महिलाएं मेनोपॉज के दौरान बार-बार हॉट फ्लैशेस (अचानक तेज गर्मी लगना) और रात में पसीना आने जैसी समस्याओं का सामना करती है। ऐसी महिलाओं में घबराहट, डिप्रेशन, अनिद्रा के लक्षण भी दिखते हैं। इससे समय से पहले अंडाशय के काम बंद करने का जोखिम भी बढ़ जाता है।</p>
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		<title>अच्छी खबर: 80% तक टल सकता ब्रेन स्ट्रोक का खतरा? अध्ययन में जोखिम को लेकर हुआ खुलासा; ये हैं तीन आसान तरीके</title>
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		<dc:creator><![CDATA[RNSNS]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 03 Jul 2026 04:13:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Health]]></category>
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					<description><![CDATA[वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, करीब 80% ब्रेन स्ट्रोक के मामलों को रोका जा सकता है। मेडिटेरेनियन डाइट, 50 वर्ष से अधिक उम्र में शिंगल्स वैक्सीन और असुंडेक्सियन नाम की नई दवा स्ट्रोक का जोखिम कम करने में मददगार हो सकती हैं। विशेषज्ञों ने नियमित ब्लड प्रेशर व शुगर जांच, संतुलित आहार, व्यायाम, धूम्रपान से दूरी [&#8230;]]]></description>
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<p class="wp-block-paragraph"><a href="https://www.amarujala.com/user/himanshu-mishra-election" target="_blank" rel="noopener"></a></p>



<p class="wp-block-paragraph">वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, करीब 80% ब्रेन स्ट्रोक के मामलों को रोका जा सकता है। मेडिटेरेनियन डाइट, 50 वर्ष से अधिक उम्र में शिंगल्स वैक्सीन और असुंडेक्सियन नाम की नई दवा स्ट्रोक का जोखिम कम करने में मददगार हो सकती हैं। विशेषज्ञों ने नियमित ब्लड प्रेशर व शुगर जांच, संतुलित आहार, व्यायाम, धूम्रपान से दूरी और डॉक्टर की सलाह के अनुसार इलाज जारी रखने की सलाह दी है।<br><br>ब्रेन स्ट्रोक दुनिया में मौत और विकलांगता की बड़ी वजहों में से एक है। इस सबके बीच अच्छी खबर कि करीब 80 फीसदी स्ट्रोक के मामलों पर रोक लगाई जा सकती है। हाल ही में सामने आए तीन अलग-अलग वैज्ञानिक अध्ययनों में स्ट्रोक का खतरा कम करने के तीन असरदार तरीके सामने आए हैं। इनमें मेडिटेरेनियन डाइट, शिंगल्स (हरपीज जोस्टर) का टीका और असुंडेक्सियन नाम की नई दवा शामिल हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">जब दिमाग तक खून पहुंचना बंद हो जाता है या दिमाग की किसी रक्त वाहिका से खून बहने लगता है तब स्ट्रोक आता है। इससे दिमाग की कोशिकाएं तेजी से नष्ट होने लगती हैं। अगर वक्त पर इलाज न मिले तो मरीज की मौत भी हो सकती है या शरीर का कोई हिस्सा हमेशा के लिए काम करना बंद कर सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>दूसरी बार स्ट्रोक से बचा सकती है नई दवा असुंडेक्सियन</strong><br>न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार असुंडेक्सियन नाम की नई दवा उन लोगों में दूसरी बार स्ट्रोक आने का खतरा कम कर सकती है, जिन्हें पहले इस्केमिक स्ट्रोक या ट्रांजिएंट इस्केमिक अटैक (टीआईए) हो चुका है। यह दवा शरीर में खून के थक्के बनने की प्रक्रिया को कम करती है और दोबारा स्ट्रोक का जोखिम कम हो सकता है। हालांकि, यह दवा अभी सभी मरीजों के लिए नियमित इलाज का हिस्सा नहीं बनी है। इसका इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह पर ही किया जाना चाहिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>फल, सब्जियां व जैतून का तेल लेने वालों में स्ट्रोक का खतरा कम</strong><br>न्यूरोलॉजी ओपन एक्सेस में प्रकाशित एक अध्ययन में 1.05 लाख से अधिक लोगों के खानपान का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि मेडिटेरेनियन डाइट अपनाने वाली महिलाओं में स्ट्रोक का खतरा कम था। इस डाइट में मुख्य रूप से ताजे फल और सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, मेवे और बीज, जैतून का तेल और ओमेगा-3 से भरपूर मछली शामिल हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह डाइट ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, खराब कोलेस्ट्रॉल और शरीर की सूजन को काबू करने में मदद करती है। इससे स्ट्रोक का खतरा कम होता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>ब्लड प्रेशर व शुगर की नियमित जांच कराएं</strong><br>विशेषज्ञों के मुताबिक हाई ब्लड प्रेशर स्ट्रोक की सबसे बड़ी वजह है। इसके अलावा डायबिटीज, धूम्रपान, मोटापा, शारीरिक गतिविधि की कमी, असंतुलित खानपान और बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल भी स्ट्रोक का खतरा बढ़ाते हैं। विशेषज्ञों ने सलाह है कि स्ट्रोक से बचने के लिए रोज फल और हरी सब्जियां खाएं, नमक और तली-भुनी चीजें कम करें। ब्लड प्रेशर और शुगर की नियमित जांच कराएं। धूम्रपान व तंबाकू से दूर रहें। रोज 30 मिनट व्यायाम करें। 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोग डॉक्टर की सलाह पर शिंगल्स वैक्सीन की जानकारी लें, जिन्हें पहले स्ट्रोकआ चुका है, वे दवाएं कभी न छोड़ें और नियमित फॉलो-अप कराते रहें।</p>
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		<title>चिंताजनक: डिब्बा बंद खाने में मिलाए जा रहे रसायन, बढ़ रहा दिल की बीमारियों का खतरा</title>
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		<pubDate>Sat, 27 Jun 2026 05:34:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[India]]></category>
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					<description><![CDATA[पैकेज्ड और डिब्बा बंद खाने को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए मिलाए जाने वाले प्रिजरवेटिव्स दिल के स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकते हैं। एक नए अध्ययन में पाया गया है कि इन रसायनों का अधिक सेवन उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों के खतरे को बढ़ा सकता है। यह शोध फ्रांस में लगभग [&#8230;]]]></description>
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<p class="wp-block-paragraph">पैकेज्ड और डिब्बा बंद खाने को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए मिलाए जाने वाले प्रिजरवेटिव्स दिल के स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकते हैं। एक नए अध्ययन में पाया गया है कि इन रसायनों का अधिक सेवन उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों के खतरे को बढ़ा सकता है। यह शोध फ्रांस में लगभग 1.12 लाख लोगों पर किया गया। पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट-<br><br>डिब्बा बंद खाने को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए मिलाए जाने वाले प्रिजरवेटिव्ज दिल को खोखला कर रहे हैं। खाद्य पदार्थों के साथ इन प्रिजरवेटिव्स का अधिक सेवन उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों के लिए बड़ा खतरा है। यह खुलासा फ्रांस में 1.12 लाख लोगों पर किए गए अध्ययन में किया गया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">शोधकर्ताओं ने यह विश्लेषण किया कि प्रतिभागी किन खाद्य पदार्थों का सेवन कर रहे हैं और उनमें कौन-कौन से प्रिजरवेटिव्ज मौजूद हैं। इसके बाद करीब सात से आठ वर्षों तक प्रतिभागियों के स्वास्थ्य पर नजर रखी गई। इस दौरान यह दर्ज किया गया कि किन लोगों में उच्च रक्तचाप, हार्ट अटैक, स्ट्रोक या एंजाइना जैसी हृदय संबंधी समस्याएं विकसित हुईं। यूरोपियन हार्ट जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार लगभग सभी प्रतिभागी किसी न किसी प्रकार के खाद्य प्रिजरवेटिव्स के संपर्क में थे। अध्ययन के शुरुआती दो वर्षों के दौरान करीब 99 प्रतिशत प्रतिभागियों ने ऐसे प्रिजरवेटिव्ज वाले खाद्य पदार्थों का सेवन किया था। जिन लोगों ने कुछ विशेष प्रिजरवेटिव्ज का सबसे अधिक सेवन किया, उनमें उच्च रक्तचाप होने का खतरा लगभग 29 प्रतिशत    अधिक था। वहीं हृदय रोगों का खतरा भी करीब 16 प्रतिशत तक बढ़ा हुआ पाया गया। विश्लेषण में सोडियम नाइट्राइट, पोटैशियम सोर्बेट और कुछ सल्फाइट यौगिकों को विशेष रूप से अधिक जोखिम से जुड़ा पाया गया। इसके अलावा एंटीऑक्सिडेंट श्रेणी के कुछ प्रिजरवेटिव्ज के अधिक सेवन और रक्तचाप बढ़ने के बीच भी संबंध देखा गया।</p>



<h2 class="wp-block-heading"><strong>डिब्बा बंद खाने : चयापचय प्रणाली हो सकती है प्रभावित</strong></h2>



<p class="wp-block-paragraph">शोधकर्ताओं के अनुसार यह अध्ययन इस विषय को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक कदम है। उनका कहना है कि अभी और प्रयोगात्मक अनुसंधान की आवश्यकता है, क्योंकि यह अध्ययन अवलोकन आधारित है और इससे प्रत्यक्ष कारण-परिणाम संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता। शोधकर्ताओं का मानना है कि कुछ प्रिजरवेटिव्ज शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ा सकते हैं या चयापचय प्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे लंबे समय में हृदय स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि इस तरह के अवलोकन आधारित अध्ययन किसी बीमारी का प्रत्यक्ष कारण सिद्ध नहीं करते। जो लोग अधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ खाते हैं, उनकी जीवनशैली भी कई मामलों में अलग हो सकती है। कम शारीरिक गतिविधि, अधिक नमक और वसा का सेवन तथा अन्य स्वास्थ्य संबंधी आदतें भी हृदय रोग के जोखिम को प्रभावित कर सकती हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>ताजा और कम प्रोसेस्ड भोजन को प्राथमिकता देने की सलाह&#8230;</strong><br>अध्ययन के निष्कर्ष यह संकेत देते हैं कि अत्यधिक प्रोसेस्ड और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन हृदय स्वास्थ्य के लिए अनुकूल नहीं हो सकता। स्वास्थ्य विशेषज्ञ सामान्य तौर पर ताजा, कम प्रोसेस्ड और घर में तैयार भोजन को प्राथमिकता देने की सलाह देते हैं।</p>
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		<title>एचआईवी के इलाज में बड़ी कामयाबी, मल्टीपल स्केलेरोसिस की दवा वायरस के खात्मे में कारगर</title>
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		<pubDate>Thu, 25 Jun 2026 04:23:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Health]]></category>
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					<description><![CDATA[एक नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया है कि मल्टीपल स्केलेरोसिस के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा फिंगोलिमोड एचआईवी वायरस को शरीर में पनपने से रोकने में काफी प्रभावी हो सकती है। एक एचआईवी संक्रमित मरीज में यह दवा लेने के दौरान वायरस का स्तर बेहद कम पाया गया और तीन साल के इलाज [&#8230;]]]></description>
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<p class="wp-block-paragraph">एक नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया है कि मल्टीपल स्केलेरोसिस के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा फिंगोलिमोड एचआईवी वायरस को शरीर में पनपने से रोकने में काफी प्रभावी हो सकती है। एक एचआईवी संक्रमित मरीज में यह दवा लेने के दौरान वायरस का स्तर बेहद कम पाया गया और तीन साल के इलाज के बाद उसके शरीर में सक्रिय एचआईवी लगभग खत्म हो गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">एचआईवी के इलाज और फंक्शनल क्योर की दिशा में वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता मिली है। एक नये अध्ययन में पाया गया है कि मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी से जुड़ी दुर्लभ बीमारी (मल्टीपल स्केलेरोसिस) के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा फिंगोलिमोड एचआईवी वायरस को शरीर में पनपने से रोकने में बेहद प्रभावी साबित हो सकती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">शोधकर्ताओं ने एक ऐसे मरीज का अध्ययन किया, जिसे मल्टीपल स्केलेरोसिस था और वह कई वर्षों से फिंगोलिमोड ले रहा था। इस दौरान उसे एचआईवी संक्रमण हुआ। वैज्ञानिकों ने पाया कि सामान्य मरीजों की तुलना में उसके शरीर में वायरस का स्तर काफी कम था। तीन साल तक एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) लेने के बाद उसके शरीर में एचआईवी का सक्रिय भंडार लगभग खत्म हो गया। स्पेन के बार्सिलोना के आईडीआईबीएपीएस और हॉस्पिटल क्लीनिक डी बार्सिलोना के वैज्ञानिकों ने मिलकर ये अध्ययन किया है। इसके मुताबिक इलाज शुरू होने के एक साल बाद मरीज के शरीर में वायरस का रिजर्वायर भी अन्य मरीजों की तुलना में 28 गुना कम पाया गया। सबसे चौंकाने वाली बात रही कि तीन साल बाद वैज्ञानिकों को उसके शरीर में कोई भी सक्रिय और पूर्ण एचआईवी वायरस नहीं मिला।</p>



<p class="wp-block-paragraph">एचआईवी को छिपने नहीं देती यह दवा : एचआईवी की सबसे बड़ी चुनौती है कि इलाज के बाद भी वायरस शरीर की कुछ कोशिकाओं में छिपा रहता है। मगर, इस अध्ययन में फिंगोलिमोड लेने वाले मरीज की कोशिकाओं से न सिर्फ वायरस खत्म हो गया बल्कि उसको दोबारा सक्रिय करना भी संभव नहीं हो पाया।<br><br></p>
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		<title>हृदय के लिए फलों की मात्रा नहीं, सही चयन जरूरी; जानें फ्लैवानॉल युक्त खाद्य पदार्थ का सेवन करने वाले कितने</title>
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		<dc:creator><![CDATA[RNSNS]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 22 Jun 2026 04:16:18 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[चौंकाने वाली बात यह रही कि कई लोग प्रतिदिन पांच बार फल और सब्जियां खाने के बावजूद भी पर्याप्त फ्लैवानॉल नहीं ले पा रहे थे। प्रमुख लेखक डॉ. जेवियर ओटावियानी के अनुसार लोग अक्सर मान लेते हैं कि फल और सब्जियां खाने से उन्हें सभी जरूरी पोषक तत्व मिल जाते हैं, लेकिन वास्तविकता अलग है। [&#8230;]]]></description>
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<p class="wp-block-paragraph">चौंकाने वाली बात यह रही कि कई लोग प्रतिदिन पांच बार फल और सब्जियां खाने के बावजूद भी पर्याप्त फ्लैवानॉल नहीं ले पा रहे थे। प्रमुख लेखक डॉ. जेवियर ओटावियानी के अनुसार लोग अक्सर मान लेते हैं कि फल और सब्जियां खाने से उन्हें सभी जरूरी पोषक तत्व मिल जाते हैं, लेकिन वास्तविकता अलग है। भोजन में कुछ विशेष फलों, सब्जियों और पेयों को शामिल करने से फ्लैवानॉल की मात्रा काफी बढ़ सकती है।<br><br>स्वस्थ रहने के लिए रोजाना पांच बार फल और सब्जियां खाने की सलाह दी जाती है, लेकिन केवल मात्रा बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि खाद्य पदार्थों का चयन भी महत्वपूर्ण है। ताजा अध्ययन में सामने आया कि अधिकतर लोग ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं कर रहे हैं जिनमें प्राकृतिक फ्लैवानॉल यौगिक पाया जाता है। यह यौगिक हृदय रोग से होने वाली मृत्यु के जोखिम को कम करता है।<br><br>यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग, हार्वर्ड मेडिकल स्कूल, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया-डेविस और मार्स इंक. के वैज्ञानिकों का यह अध्ययन फूड एंड फंक्शन में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं ने अमेरिका और ब्रिटेन के 30 हजार से अधिक लोगों के आहार संबंधी आंकड़ों और जैविक संकेतकों का विश्लेषण किया। अध्ययन में पाया गया कि 20% से भी कम लोग उस स्तर तक फ्लैवानॉल का सेवन कर रहे थे।<br><br>चौंकाने वाली बात यह रही कि कई लोग प्रतिदिन पांच बार फल और सब्जियां खाने के बावजूद भी पर्याप्त फ्लैवानॉल नहीं ले पा रहे थे। प्रमुख लेखक डॉ. जेवियर ओटावियानी के अनुसार लोग अक्सर मान लेते हैं कि फल और सब्जियां खाने से उन्हें सभी जरूरी पोषक तत्व मिल जाते हैं, लेकिन वास्तविकता अलग है। भोजन में कुछ विशेष फलों, सब्जियों और पेयों को शामिल करने से फ्लैवानॉल की मात्रा काफी बढ़ सकती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>सही पांच फल चुनना जरूरी</strong><br>यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के प्रोफेसर गुंटर कूनले का कहना है कि दिन में पांच बार फल और सब्जियां खाने की सलाह सही है, लेकिन अब यह समझने की जरूरत है कि वे पांच विकल्प कौन से हों। अलग-अलग फल और सब्जियां केवल विटामिन और खनिज ही नहीं, बल्कि विभिन्न जैव-सक्रिय यौगिक भी प्रदान करती हैं, जिनके स्वास्थ्य पर अलग-अलग प्रभाव हो सकते हैं।</p>
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