पहली बारिश भी क्यों नहीं झेल पाते करोड़ों के पुल और एक्सप्रेसवे; जिम्मेदार कौन, सरकार का क्या रुख?

पहली बारिश भी क्यों नहीं झेल पाते करोड़ों के पुल और एक्सप्रेसवे; जिम्मेदार कौन, सरकार का क्या रुख?

हर साल पहली बारिश के साथ नई सड़कों, पुलों और एक्सप्रेसवे को नुकसान पहुंचने की खबरें सामने आती हैं। इसके बाद करोड़ों रुपये की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निर्माण, गुणवत्ता और निगरानी को लेकर सवाल लगातार उठने लगते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार इसे रोकने के लिए क्या कदम उठा रही है और विशेषज्ञ इस पर क्या कहते हैं। आइए जानते हैं। 

बारिश का मौसम आते ही कुछ खबरें हमें हर साल पढ़ने को मिलती हैं। जैसे मुंबई में लगातार बारिश से जनजीवन ठप पड़ा, गुरुग्राम में कुछ देर की बारिश से बड़ी-बड़ी बिल्डिंगों सोसाइटियों और सड़कों पर पानी भरा। इसी तरह बीते कुछ वक्त एक खबर और सुनाई देती है। पहली बारिश नहीं झेल सका फला एक्सप्रेस वे या बारिश में बहा निर्माणाधीन पुल।  कुछ ऐसी ही खबरें इस बारिश में भी सुनाई दीं। 

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इसकी वजह सिर्फ बारिश की वजह से हजारों करोड़ में बने एक्सप्रेस वे धंस जाते हैं या कोई और भी वजह है? बीते वर्षों में इस तरह के कितने मामले सामने आए हैं? सरकार इस तरह के मामलों पर क्या एक्शन लेती है? विशेषज्ञ इसके लिए किसे जिम्मेदार मानते हैं? आइये जानते हैं…

मामला क्या है?

महाराष्ट्र में भारी बारिश का दौर जारी है। मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे के मिसिंग लिंक पर सोमवार को भूस्खलन के चलते पुणे से मुंबई जाने वाले सभी वाहनों का रास्ता बदल दिया गया। इस मिसिंग लिंक की शुरुआत इसी साल मई में हुई थी। करीब 6,695 करोड़ रुपये की लागत से बना यह 13 किलोमीटर लंबा मिसिंग लिंक मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर सह्याद्रि की पहाड़ियों से होकर गुजरता है।

इसी तरह हाल ही में शुरू हुए दिल्ली-देहरादून इकोनॉमिक कॉरिडोर की सड़क भी बारिश के चलते कई जगह धंस गई। 213 किलोमीटर लंबे, छह लेन वाले दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे का उद्घाटन भी इसी साल अप्रैल में हुआ था। इसे बनाने में 12,000 करोड़ रुपये से अधिक की लागत आई है।

क्या ऐसे मामले पहली बार आ रहे हैं?

इसी साल फरवरी में सरकार से पूछा गया था कि बारिश की वजह से कितने नए बने एक्सप्रेसवे, सड़के और ब्रिजों को नुकसान हुआ। ऐसा होने पर सबंधित कॉन्ट्रैक्टर या एजेंसी के खिलाफ क्या कोई कार्रवाई की गई। इसके जवाब में सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय ने बताया था कि वर्ष 2025-26 के दौरान देशभर में 51 नए बने राष्ट्रीय राजमार्ग और एक्सप्रेसवे परियोजनाओं में बारिश के कारण नुकसान दर्ज किया गया। जिन 51 मामलों के बारे में सरकार ने अपने जवाब में बताया उनमें  सबसे ज्यादा 13 मामले जम्मू-कश्मीर के थे। इसके बाद हिमाचल में 12, महाराष्ट्र में आठ, उत्तराखंड में सात,  मध्य प्रदेश में चार, केरल और पश्चिम बंगाल में दो-दो और गुजरात, राजस्थान, पंजाब और नगालैंड में एक-एक जगह पर इस तरह के नुकसान की जानकारी सरकार ने दी।  

इसकी वजह क्या होती है?

टोल प्लानिंग एक्सपर्ट और सामाजिक कार्यकर्ता संजय शिरोडकर कहते हैं कि किसी भी सड़क, एक्सप्रेसवे या पुल के निर्माण से पहले विस्तृत प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसमें जरूरत का आकलन, डीपीआर (डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट), बजट स्वीकृति, जमीन अधिग्रहण, पर्यावरण मंजूरी, टेंडर प्रक्रिया, निर्माण और गुणवत्ता जांच जैसे कई चरण शामिल होते हैं। इसलिए यदि किसी परियोजना में शुरुआती बारिश में ही सड़क धंसने, भूस्खलन या अन्य तरह की क्षति होती है, तो केवल भारी बारिश को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उनके मुताबिक कई बार इसकी वजह निर्माण की गुणवत्ता में कमी, जल निकासी (ड्रेनेज) की कमजोर व्यवस्था, ढलानों की पर्याप्त सुरक्षा न होना या परियोजना के दौरान तय मानकों का पूरी तरह पालन न होना भी हो सकता है।

इसे कैसे रोका जा सकता है?

शिरोडकर के अनुसार ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए निर्माण की गुणवत्ता से किसी भी तरह का समझौता नहीं होना चाहिए। जिन इलाकों में भारी बारिश, भूस्खलन या पर्यावरणीय जोखिम पहले से मौजूद हैं, वहां परियोजना की योजना उसी हिसाब से बनाई जानी चाहिए। इसके अलावा भारतीय मौसम विभाग के साथ लगातार समन्वय रखकर मौसम की अग्रिम चेतावनियों का उपयोग किया जा सकता है, ताकि जरूरत पड़ने पर समय रहते सुरक्षा उपाय किए जा सकें। उनका कहना है कि नियमित गुणवत्ता जांच, बेहतर ड्रेनेज व्यवस्था और निर्माण के बाद समय-समय पर सुरक्षा ऑडिट भी ऐसी घटनाओं की आशंका को काफी हद तक कम कर सकते हैं।

सरकार का इस तरह के मामलों पर क्या कहना है?

सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार, बारिश के दौरान सड़कों और पुलों को होने वाले नुकसान के पीछे एक ही कारण जिम्मेदार नहीं होता। अलग-अलग परियोजनाओं में अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन, बाढ़, नदी के तेज बहाव, सड़क में पानी भरने और मिट्टी के कटाव जैसी वजहें सामने आई हैं। कुछ मामलों में प्रारंभिक जांच में निर्माण संबंधी खामियां, डिजाइन की कमी या अधूरे निर्माण कार्य की भी पहचान हुई है। जहां भी ऐसी कमियां पाई गईं, वहां संबंधित एजेंसियों से जवाब मांगा गया और सुधारात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए गए।

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