बिहार की राजनीति में खुला नया विकल्प: बांकीपुर से प्रशांत किशोर की जीत बड़ा उभार, क्या NDA-RJD के लिए संदेश?

बिहार की राजनीति में खुला नया विकल्प: बांकीपुर से प्रशांत किशोर की जीत बड़ा उभार, क्या NDA-RJD के लिए संदेश?

बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे ने बिहार की राजनीति में नए विकल्प की चर्चा तेज कर दी है। प्रशांत किशोर के उभार ने एनडीए और राजद दोनों के पारंपरिक समीकरणों पर सवाल खड़े किए हैं। राजनीतिक दल अब बदलते जनादेश और युवाओं की अपेक्षाओं को नए सिरे से समझने की चुनौती का सामना कर रहे हैं।

बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के नतीजे ने राज्य में नई राजनीति और नए विकल्प की खिड़की खोल दी है। इस नतीजे ने जहां सत्तारूढ़ राजग और विपक्षी महागठबंधन के लिए खतरे की घंटी बजाई है, वहीं मुख्यधारा के दलों को युवाओं की आकांक्षाओं को लेकर सचेत होने का संदेश भी दिया है। नतीजे बताते हैं कि इस चुनाव में न सिर्फ राजग का अगड़ा-अति पिछड़ा बल्कि राजद का मुस्लिम-यादव समीकरण भी औंधे मुंह गिरा है। यहां तक कि भाजपा उम्मीदवार अपने बूथ पर भी पीछे रहा।

इस नतीजे के कई गहरे राजनीतिक निहितार्थ हैं। महज एक वर्ष पूर्व जिस जनसुराज पार्टी के 238 में से 236 उम्मीदवारों ने जमानत गंवा दी थी, उसी पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने अपने पहले ही चुनाव में भाजपा को उसके सबसे मजबूत गढ़ में पटखनी दी है। भाजपा उम्मीदवार का आधार स्वजातीय कायस्थ और दूसरे अगड़े वर्ग के कुछ हिस्से तक ही सीमित रह गया। वहीं राजद के वोट बैंक में आई 30 हजार वोटों की कमी बताता है कि उसके मूल यादव-मुस्लिम मतदाता (22 फीसदी) ने इस बार उससे दूरी बरत ली। बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे ने बीते दो दशक से भी अधिक समय से चली आ रही राजग बनाम राजद केंद्रित राजनीति के लिए भी खतरे की घंटी बजाई है।

उपचुनावों ने कई बार बड़े बदलावों में भूमिका निभाई
1993 में वैशाली सीट पर जनता दल के सांसद शिवशरण सिंह के निधन के बाद हुआ उपचुनाव बिहार की राजनीति का बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ था। इसमें बिहार पीपुल्स पार्टी की लवली आनंद ने सत्ताधारी जनता दल की किशोरी सिन्हा को पटखनी दी। जीत से उत्सािहत आनंद मोहन ने 1995 के विधानसभा चुनाव में 259 सीटों पर उम्मीदवार उतार दिए। इससे सत्ता विरोधी वोट बंटे, जिसका सीधा लाभ लालू प्रसाद  और जनता दल को मिला और उनकी सत्ता में वापस आसान हो गई।

इलाहाबाद (1988) : वीपी सिंह का उदय
1988 का इलाहाबाद लोकसभा उपचुनाव ऐतिहासिक है। वीपी सिंह ने कांग्रेस के सुनील शास्त्री को भारी अंतर से हराया। इस हार ने तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के खिलाफ माहौल तैयार किया और 1989 के आम चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने।

चिकमगलूर (1978) : इंदिरा की वापसी
आपातकाल के बाद 1977 में चुनाव हार चुकीं पूर्व  पीएम इंदिरा गांधी ने 1978 के चिकमगलूर उपचुनाव में जीत दर्ज कर अपनी खोई साख को फिर से कायम किया और 1980 के आम चुनाव में प्रचंड बहुमत से जीत कर दोबारा प्रधानमंत्री बनीं।

चिकमंगलूर हो या इलाहाबाद, अब उसी कड़ी में बांकीपुर का यह उपचुनाव परिणाम भी देखा जा रहा है। भाजपा के लिए यह हार सिर्फ एक सीट गंवाने तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरी और पारंपरिक वोट बैंक में संभावित सेंध का संकेत भी है।

जनादेश स्वीकार…पार्टी करेगी मंथन : नितिन नवीन
बांकीपुर उपचुनाव में भाजपा की हार के बाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने कहा कि भाजपा  जनादेश का सम्मान करती है और बांकीपुर तथा दतिया के नतीजों पर गंभीरता से आत्ममंथन करेगी। नवीन ने कहा कि पार्टी नई ऊर्जा और संकल्प के साथ जनता के बीच जाएगी और उसका भरोसा और मजबूत करने का प्रयास करेगी। वहीं गुजरात की मांजलपुर सीट पर मिली जीत के लिए उन्होंने मतदाताओं व कार्यकर्ताओं का आभार जताया।

प्रशांत किशोर की जीत पर राजद सांसद मीसा भारती ने कहा कि यह पार्टी के लिए चिंता की बात है और नेतृत्व को हार पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। वहीं,  रोहिणी आचार्य ने अपने भाई और राजद के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव पर तंज कसा। उन्होंने कहा, जीत उसी की होती है जो लगातार लड़ता है, जनता से जुड़ा रहता है।

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