अरब-इस्लामिक नाटो को बनाने का प्रस्ताव कितना पुराना है? हालिया समय में इस सैन्य गठबंधन को बनाने का प्रस्ताव कौन और क्यों लाया है? इसमें कौन-कौन से देश शामिल हो सकते हैं? इसके अलावा भारत के लिए ऐसे किसी अरब नाटो के अस्तित्व में आने के क्या मायने होंगे? आइये जानते हैं…
पश्चिम एशिया में इस्राइल और हमास के बीच जारी संघर्ष के चलते हालात तेजी से बदल रहे हैं। दक्षिण एशिया में मौजूदगी के बावजूद पाकिस्तान भी इसमें खासी दिलचस्पी दिखा रहा है। इस बीच बुधवार को इस्लामिक जगत पर खतरे का बहाना बनाकर पाकिस्तान ने सऊदी अरब से रक्षा समझौता कर लिया। रिपोर्ट्स की मानें तो इसके तहत दोनों में से किसी भी देश के खिलाफ किसी भी हमले को दोनों के खिलाफ आक्रमण माना जाएगा।
गौरतलब है कि भारत की तरफ से ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम दिए जाने के बाद से ही पाकिस्तान लगातार अरब और इस्लामिक देशों के साथ आने की बात करता रहा है। ऐसे में जब इस्राइल ने हमास को खत्म करने के लिए न सिर्फ फलस्तीन के गाजा, बल्कि वेस्ट बैंक को भी निशाना बनाया और आसपास के आधा दर्जन देशों पर भी हमले बोले तो इस्लामिक देशों की लामबंदी की कोशिशों में पाकिस्तान ने भी मौका ढूंढना शुरू कर दिया।
इस्राइल की तरफ से इन बेरोकटोक हमलों के बाद अब अरब जगत में एक सैन्य गठबंधन बनाने पर चर्चा शुरू हुई है। बताया गया है कि 40 से ज्यादा अरब और इस्लामिक देश अब अपनी सुरक्षा के लिए पश्चिमी देशों के गठबंधन- नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो) की तरह ही एक अलग गठबंधन तैयार करना चाहते हैं। इसे लेकर पाकिस्तान ने भी सहमति जताई है। हालांकि, ऐसे किसी गठबंधन के अस्तित्व में आने से पहले ही पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच समझौता हुआ है।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर सऊदी अरब से समझौता जाने के अरब-इस्लामिक नाटो को बनाने का प्रस्ताव कितना पुराना है? हालिया समय में इस सैन्य गठबंधन को बनाने का प्रस्ताव कौन और क्यों लाया है? इसमें कौन-कौन से देश शामिल हो सकते हैं? इसके अलावा भारत के लिए ऐसे किसी अरब नाटो के अस्तित्व में आने के क्या मायने होंगे? आइये जानते हैं…
पहले जानें- क्या है अरब-इस्लामिक नाटो के प्रस्ताव से जुड़ा इतिहास?
2015 में मिस्र ने पहली बार अरब देशों के एक साझा सैन्य गठबंधन के गठन का प्रस्ताव आगे रखा था। शुरुआत में मिस्र का यह प्रस्ताव यमन और लीबिया में सरकार और बागी गुटों के बीच चल रहे संघर्ष को खत्म कराने के मकसद से रखा गया था। तब कई देशों ने कहा था कि वह ऐसे गठबंधन का समर्थन करते हैं। हालांकि, तब अरब देशों के यह दावे खोखले साबित हुए। गठबंधन के नेतृत्व और फंडिंग को लेकर योजनाएं आगे नहीं बढ़ पाईं।
एक साल बाद ही सऊदी अरब ने एक 34 देशों का इस्लामिक सैन्य गठबंधन बनाने का एलान किया। इसका मकसद आतंकवाद का सामना करने के लिए एक संयुक्त सेना बना था। तब इसे ‘मुस्लिम नाटो’ का नाम दिया गया। तब भी ऐसे दावे हुए थे कि मिस्र, कतर, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), तुर्किये, मलयेशिया, पाकिस्तान और कुछ अन्य इस्लामिक अफ्रीकी देश इस गठबंधन का हिस्सा बन सकते हैं। हालांकि, ईरान ने इससे दूरी बनाई थी। सैन्य गठबंधन के जरिए सऊदी अरब अफ्रीकी क्षेत्र में इस्लामिक कट्टरवाद और आतंकवाद जैसी समस्याओं से निपटने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा था। इसके लिए अमेरिका के तत्कालीन डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने भी समर्थन जताया था। हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप इस गठबंधन में इस्राइल की भी भूमिका चाहते थे, जिसके जरिए ईरान के खिलाफ खुफिया जानकारी जुटाने में अमेरिका को मदद मिलती रहे। ऐसे ही कुछ मतभेदों के बीच आखिरकार मुस्लिम नाटो के गठन का प्रस्ताव कागजों में ही दफन होकर रह गया।
अब फिर क्यों उठी है अरब-इस्लामिक नाटो की चर्चा?
हमास की तरफ से इस्राइल पर 7 अक्तूबर 2023 को हमला किए जाने के बाद से ही इस्राइली सेना ने फलस्तीन पर हमले जारी रखे हैं। इतना ही नहीं उसने हमास का समर्थन करने वाले छह देशों को निशाना बनाया है। इनमें- सीरिया, यमन, ईरान, लेबनान, ट्यूनीशिया और कतर शामिल हैं। चौंकाने वाली बात यह है कतर पर इस्राइल की तरफ से 9 सितंबर 2025 को जब हमला किया गया था, तब हमास का एक नेतृत्व दल वहां अमेरिका की तरफ से पेश संघर्ष विराम के प्रस्ताव पर चर्चा के लिए बैठक कर रहा था। इस्राइल के इस हमले में छह लोगों की मौत हुई थी, जिनमें हमास के प्रमुख नेता के बेटे की भी जान गई थी।
कतर पर हुए इस हमले के बाद पूरे अरब और इस्लामिक जगत ने इस्राइल की निंदा की और इस्राइल के बेरोकटोक हमलों पर लगाम लगाने के तरीकों पर विचार शुरू कर दिया। दरअसल, कतर में अमेरिका का बड़ा सैन्य बेस है, जिसकी सुरक्षा अमेरिकी रक्षा प्रणाली करती है। हालांकि, इसके बावजूद इस्राइल ने कतर को निशाना बनाया। कई विश्लेषकों का मानना था कि अरब जगत में अमेरिका का अच्छा-खासा प्रभाव होने के बावजूद इस क्षेत्र में मौजूद देश इस्राइल से सुरक्षित नहीं हैं ।
अब जानें- किस राष्ट्राध्यक्ष ने क्या कहा?
इस्लामिक देशों की मेजबानी कर रहे कतर के शासक शेख तमीम ने कहा कि वह ऐसे किसी भी पक्ष (इस्राइल) से समझौता नहीं कर सकते, जो डरपोक और धोखेबाज हो। वह पक्ष जो लगातार समझौते में शामिल दूसरे पक्ष को खत्म करने की कोशिश में हों, वह बातचीत को नाकाम करने की हरसंभव कोशिश करेंगे। जब वे कहते हैं कि वह अपने बंधकों को छुड़ाना चाहते हैं तो वह सीधे झूठ बोल रहे हैं।
ईरान-इराक की तरफ से भी सैन्य गठबंधन की मांग की गई। ईरानी राष्ट्रपति ने कहा कि कल कोई भी अरब-इस्लामिक देश इस्राइल जैसे दुश्मन का निशाना बन सकता है। इसलिए एकजुट होना होगा। वहीं, इराक के प्रधानमंत्री मोहम्मद शिया अल-सूदानी ने कहा कि इसकी कोई वजह नहीं है कि इस्लामिक देश अपनी सुरक्षा के लिए एक संयुक्त सुरक्षाबल नहीं बना सकते। उन्होंने कहा कि इस्लामिक जगत के पास कई ऐसी चीजें हैं, जिससे इस्राइल को रोका जा सकता है। सूदानी ने यह भी कहा कि इस्राइल की आक्रामकता कतर पर ही नहीं रुकेगी।
तुर्किये के राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोआन ने सीधे तौर पर गठबंधन बनाने को लेकर टिप्पणी नहीं कि लेकिन उन्होंने इस्राइल को आर्थिक तौर पर निचोड़ देना होगा और पुराने अनुभव बताते हैं कि इससे ही नतीजे निकलते हैं।
पाकिस्तान की तरफ से बैठक में पहुंचे प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और विदेश मंत्री इशाक डार ने अरब-इस्लामिक टास्क फोर्स बनाने की मांग की थी। डार ने एलान किया था कि इस्राइल को इस्लामिक देशों पर हमला करने और लोगों को बेरहमी से मारने के बाद बच निकलने नहीं देना चाहिए। उन्होंने कहा था कि दुनिया के 1.8 अरब मुस्लिम इस सम्मेलन पर नजर रख रहे हैं।
भारत के लिए क्या होंगे अरब-इस्लामिक नाटो के गठन के मायने?
अरब और इस्लामिक देशों की तरफ से नाटो जैसे जिस संगठन को बनाने की वकालत की जा रही है, उसके केंद्र में इस्राइल के उभरते खतरे को रखा जा रहा है। हालांकि, पाकिस्तान का इस गठबंधन से जुड़ने की कोशिश करना या इसकी वकालत करना भारत के लिए काफी प्रभावकारी हो सकता है। दरअसल, पाकिस्तान इस वैश्विक मंच को इस्लाम के नाम पर भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकता है। इससे पहले ही पाकिस्तान ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कंट्रीज (ओआईसी) जैसे मंचों को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश कर चुका है।
दूसरी तरफ अगर नाटो जैसा कोई इस्लामिक देशों का गठबंधन अस्तित्व में आता है तो इसमें तुर्किये भी जुड़ा रहेगा, जो कि बीते कुछ वर्षों से लगातार पाकिस्तान का समर्थन करता रहा है। हाल ही में भारत के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी तुर्किये ने न सिर्फ इस्लामाबाद को सैन्य मदद दी थी, बल्कि अपने तकनीकी विशेषज्ञों को भी भेजा था। ऐसे में अगर नाटो जैसा कोई गठबंधन, जिसमें एक पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा, भारत को सबसे ज्यादा प्रभावित करेगा। खासकर पाकिस्तान की बढ़ती आतंकवादी गतिविधियों और उसकी तरफ से भारत के खिलाफ की जा रही संघर्ष की कोशिशों को देखते हुए।
इस्राइल से रक्षा संबंधों की वजह से भी प्रभावित हो सकते हैं भारत के हित
भारत ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) में एक बैठक के दौरान गाजा में जारी संघर्ष को रोकने के पक्ष में वोट किया था। इसके अलावा भारत इस्राइल-फलस्तीन के बीच टू-स्टेट सॉल्यूशन का भी पक्षधर रहा है। हालांकि, इसके बावजूद इस्राइल और भारत के बीच व्यापार से लेकर कूटनीतिक रिश्ते तक स्थापित हैं। ऐसे में अगर भविष्य में अरब-इस्लामिक नाटो सामने आता है तो भारत और इस्राइल के रिश्तों की वजह से इसे गठबंधन के खिलाफ देखा जा सकता है।



