केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने जलवायु परिवर्तन के लिए विकसित देशो ंको जिम्मेदार ठहराया है और कहा है कि पेरिस समझौते के तहत विकसित देशों को हर साल 100 अरब डॉलर देने थे, लेकिन अब तक एक फूटी कौड़ी भी नहीं मिली है।
केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जलवायु वित्त के मुद्दे पर विकसित देशों को आईना दिखाया और विकसित दुनिया की तीखी आलोचना की। बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में एक गोलमेज सम्मेलन को संबोधित करते हुए हुए पीयूष गोयल ने विकसित देशों पर आरोप लगाया कि उन्होंने सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन किया। इसके चलते पेरिस समझौते के तहत विकसित देशों को कमजोर और जलवायु के लिहाज से सबसे ज्यादा संवेदनशील देशों को वित्तीय और तकनीकी मदद देनी थी, लेकिन विकसित देश अपनी जिम्मेदारी से मुकर रहे हैं।
पीयूष गोयल ने विकसित देशों को लगाई फटकार
पीयूष गोयल ने कहा, ‘2015 के पेरिस जलवायु समझौते में विकसित देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वित्तीय मदद देने का वादा किया था। उस समझौते में पूरी दुनिया साथ आई थी और पीएम मोदी ही थे, जिन्होंने इस मुद्दे पर पूरे ग्लोबल साउथ को एकजुट किया था। पेरिस जलवायु समझौते में सहमति बनी थी कि जिन विकसित देशों ने इतने दशकों तक जलवायु को नुकसान पहुंचाया, वे ही इसकी कीमत चुकाएंगे और आर्थिक रूप से कमजोर और प्रशांत महासागर और कैरेबियाई द्वीपीय देशों की मदद करेंगे। समझौते के तहत विकसित देशों को हर साल 100 अरब डॉलर की मदद देनी थी।’
पीयूष गोयल ने लंबे समय तक भी विकसित देशों द्वारा कार्रवाई नहीं करने पर नाराजगी जाहिर की और कहा, 11 साल बाद भी हमने न एक चवन्नी देखी है और न ही एक फूटी कौड़ी। ये सब वादे हैं। यह एक बड़ा सवाल है, जिसका जवाब अभी तक विकसित देश नहीं दे पाए हैं।
क्या है पेरिस समझौता?
साल 2009 में कोपेनहेगन में कॉप15 सम्मेलन के दौरान विकसित देश ने कमजोर देशों को जलवायु परिवर्तन की जरूरतों से निपटने के लिए हर साल 100 अरब डॉलर की आर्थिक मदद देने का वादा किया था। 2015 में पेरिस समझौते में जब विकसित देश अपना वादा पूरा करने में नाकाम रहे तो विकसित देशों द्वारा दी जाने वाली वित्तीय मदद को साल 2025 तक बढ़ाने का फैसला किया गया।
‘विकसित देश, जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार’
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा, हम दुनिया की 17 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसके बावजूद हमारा कार्बन उत्सर्जन 3 प्रतिशत भी से भी कम है। वहीं यूरोप दुनिया की आबादी का सिर्फ 3-4 प्रतिशत है, लेकिन यूरोप का कार्बन उत्सर्जन प्रतिशत बहुत ज्यादा है। जलवायु परिवर्तन की समस्या विकसित देशों की दी हुई है।



