अमेरिका ने इस्राइल के साथ खुली जंग में कूदते हुए ईरान के तीन मुख्य परमाणु ठिकानों फोर्डो, नतांज व इस्फहान पर बमधारी कर उन्हें तबाह कर दिया। ऑपरेशन मिडनाइट हैमर के तहत अमेरिका के सात बी-2 बमवर्षकों ने रविवार तड़के फोर्डो परमाणु ठिकाने पर 14 हजार किलो के 14 बंकर बस्टर बम गिराए और नौसेना की पनडुब्बियों ने नतांज और इस्फहान के परमाणु स्थलों पर 30 टॉमहॉक क्रूज मिसाइलें दागीं।

विदेशी मूर्खतापूर्ण युद्धों में अमेरिका को झोंकने के लिए अपने पूर्ववर्तियों की आलोचना कर चुनाव जीतने वाले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने देशवासियों से किसी भी युद्ध से दूर रहने का वादा किया था, पर उनका यह वादा ईरान के खिलाफ सीधी जंग में उतरने के साथ ही टूट गया। ट्रंप पहले ईरान के खिलाफ इस्राइल के हमले के पक्ष में भी नहीं थे। वह चाहते थे कि ईरान के साथ परमाणु करार प्रभावित न हो, पर जब उन्हें इसमें सफलता मिलती नहीं दिखी, तो इस्राइल के हमले का समर्थन किया।
जंग में शामिल होने या न होने पर फैसला लेने के लिए दो हफ्ते बाद निर्णय लेने के एलान के बावजूद अपने ही प्रशासन में गंभीर मतभेदों, इस्राइल की जंग में बढ़त और बेंजामिन नेतन्याहू के दो सप्ताह इंतजार नहीं करने की चेतावनी के बाद ट्रंप खुद को ईरान पर हमला करने से रोक नहीं सके। ट्रंप अब इसे दुनिया को परमाणु खतरे से बचाने का फैसला बता दें, तो भी कोई अचंभा नहीं होगा।
दो महीने के घटनाक्रम के अनुसार, ट्रंप ईरान के साथ परमाणु समझौता चाहते थे। समझौते पर कोई असर न पड़े, इसलिए ट्रंप शुरुआत में नहीं चाहते थे कि इस्राइल ईरान पर हमला करे। वह ईरान को अपने हिसाब से चलाना चाहते थे, न कि इस्राइल के अनुसार। इसीलिए मई में ट्रंप ने नेतन्याहू को ईरान पर हमला न करने की चेतावनी दी थी। उन्होंने अपने एक सहयोगी से कहा था, नेतन्याहू उन्हें मध्य-पूर्व की जंग में घसीटने की कोशिश कर रहे हैं। ट्रंप ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना चाहते थे, पर ईरान ने कोई पहल नहीं की। इस्राइल ने उन्हें विश्वास दिलाया कि सैन्य विकल्प अपनाने से ईरान के साथ समझौता करना ज्यादा आसान हो जाएगा। ट्रंप इसे लेकर असमंजस में थे कि ईरान पर इस्राइली हमले में शामिल हों या कूटनीतिक प्रयासों पर ध्यान दें।
फोन कॉल, जिसने पलट दिया खेल
सूत्रों ने बताया कि इस्राइल ने फोन कॉल में ट्रंप प्रशासन से दो-टूक कहा था कि वे ईरान के परमाणु ठिकानों को नष्ट करने के लिए समझौते पर पहुंचने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप की समयसीमा तक इंतजार नहीं कर सकते। यदि अमेरिका साथ नहीं देता, तो वह दो हफ्ते से पहले अकेले ही कार्रवाई कर देगा। इस कॉल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, रक्षा मंत्री इस्राइल काट्ज और सैन्य प्रमुख इयाल जमीर शामिल थे।
इस्राइल ने अमेरिका से कहा था, ईरान पर तत्काल कार्रवाई की जरूरत है। ट्रंप की मनाही के बाद भी जब इस्राइल ने ईरान पर हमला कर दिया, तो उन्हें समर्थन करना पड़ा। यहां तक उन्हें राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गबार्ड के बयान को भी झुठलाना पड़ा कि ईरान कोई परमाणु बम नहीं बना रहा है।
उपराष्ट्रपति वेंस ने किया था विरोध
सूत्रों ने बताया, इस्राइल के शीर्ष नेतृत्व के फोन कॉल में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने यह कहते हुए विरोध किया कि अमेरिका को सीधे तौर पर युद्ध में शामिल नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा था, इस्राइल अमेरिका को जबरन युद्ध में घसीट रहा है। कॉल में रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ भी शामिल थे। व्हाइट हाउस के ही एक अधिकारी ने वेंस की टिप्पणियों का कड़ा विरोध किया था। वेंस इराक और अफगानिस्तान समेत अतीत में हुए संघर्षों में अमेरिका की भागीदारी की आलोचना करते रहे हैं।
इस्राइली हमले छह महीने ही रोक सकते थे ईरान को
ट्रंप इस्राइली हमले के बाद भी ईरान को बातचीत के लिए कहते रहे। लेकिन, जंग में इस्राइल का पलड़ा भारी पड़ता देख खुलकर समर्थन में आ गए। ट्रंप इसका श्रेय खुद को देने से भी नहीं रोक सके। उन्होंने कहा था, इस्राइल ने जो किया, ठीक किया। ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने दिए जा सकते। हमने वार्ता के लिए 60 दिन दिए थे, पर वे नहीं माने।
ट्रंप ने यह भी कहा था, अमेरिका इस युद्ध में सीधे कूदना नहीं चाहता। हालांकि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का मानना था कि इस्राइली हमलों से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सिर्फ छह महीने तक ही रोका जा सकता है। इसके चलते, ट्रंप सीधी जंग में उतर आए।



