रिलायंस को वेनेजुएला से सीधे तेल खरीदने के लिए अमेरिका की मंजूरी, जानिए क्या हैं इसके मायने

रिलायंस को वेनेजुएला से सीधे तेल खरीदने के लिए अमेरिका की मंजूरी, जानिए क्या हैं इसके मायने

रिलायंस को वेनेजुएला से सीधे सस्ता कच्चा तेल खरीदने के लिए अमेरिकी लाइसेंस मिला। जानें जामनगर रिफाइनरी और मुकेश अंबानी के लिए इसके क्या मायने हैं। नई दिल्ली: देश की सबसे बड़ी निजी क्षेत्र की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) के लिए एक बड़ी रणनीतिक सफलता मिल गई है। अमेरिका ने मुकेश अंबानी की अगुवाई वाली कंपनी को वेनेजुएला से सीधे कच्चा तेल खरीदने के लिए जनरल लाइसेंस जारी कर दिया है। यह कदम रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है, क्योंकि इससे कंपनी को सस्ते कच्चे तेल तक सीधी पहुंच मिल सकेगी और उसके ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन में सुधार हो सकेगी।

बिचौलियों की छुट्टी, सीधा सौदा
वरिष्ठ सूत्रों के अनुसार, रिलायंस को यह मंजूरी जनवरी के अंत में मिली है। अब तक अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण रिलायंस और अन्य भारतीय रिफाइनर्स को ट्रेडर्स (बिचौलियों) के जरिए वेनेजुएला का तेल खरीदना पड़ता था। उदाहरण के लिए, इस साल रिलायंस ने विटोल के जरिए 20 लाख बैरल तेल खरीदा था।

लेकिन नए लाइसेंस के बाद, रिलायंस अब सीधे उस इकाई से तेल खरीद सकेगी जिसने तेल निकाला है। यह न केवल बिचौलियों के कमीशन को खत्म करेगा, बल्कि सप्लाई चेन को भी स्थिर करेगा। अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में लेने के बाद वहां के ऊर्जा उद्योग पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी है, जिससे यह रास्ता खुला है।

जामनगर रिफाइनरी के लिए क्यों खास है वेनेजुएला का तेल? 
रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी दुनिया का सबसे बड़ा सिंगल-साइट रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स है और यह दुनिया की सबसे जटिल रिफाइनरियों में से एक है।

  • हेवी क्रूड का फायदा: वेनेजुएला का क्रूड (विशेषकर ओरीनोको बेल्ट से) ‘हेवी’ और ‘एक्स्ट्रा-हेवी’ श्रेणी का होता है। जामनगर रिफाइनरी को विशेष रूप से ऐसे सोर और भारी क्रूड को प्रोसेस करने के लिए डिजाइन किया गया है।
  • मार्जिन में बढ़ोतरी: उत्पादन चुनौतियों के कारण यह भारी क्रूड अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क की तुलना में भारी छूट पर मिलता है। रिलायंस इस सस्ते तेल को डीजल, केरोसिन और एलपीजी जैसे उच्च मूल्य वाले उत्पादों में बदलकर अपने रिफाइनिंग मार्जिन को ऑप्टिमाइज कर सकती है।
  • पेट्रोकेमिकल इंटीग्रेशन: रिलायंस का बिजनेस मॉडल रिफाइनिंग और पेट्रोकेमिकल के एकीकरण पर टिका है। भारी क्रूड में रेजिडुअल कंटेंट ज्यादा होता है, जिसे पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक में तोड़ा जा सकता है, जिससे पॉलिमर और स्पेशलिटी केमिकल्स के मार्जिन में भी सुधार होगा।
  • भू-राजनीतिक बदलाव: रूस से हटकर अमेरिका और वेनेजुएला की ओर यह घटनाक्रम एक बड़े भू-राजनीतिक बदलाव का हिस्सा है। सूत्रों के मुताबिक, भारत अपनी क्रूड सोर्सिंग में विविधता ला रहा है, और रूस से आयात में गिरावट तय मानी जा रही है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूस से तेल खरीद रोकने और अमेरिका व संभवतः वेनेजुएला से अधिक तेल खरीदने पर सहमत हुए हैं। इस समझौते के बदले में, अमेरिका ने रूसी तेल आयात के कारण भारतीय सामानों पर लगाए गए 25% दंडात्मक शुल्क को हटा दिया है।
 

सरकारी तेल कंपनियां भी रेस में
रिलायंस के अलावा, सरकारी तेल कंपनियां भी इस मौके का फायदा उठा रही हैं। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन  और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने संयुक्त रूप से 20 लाख बैरल वेनेजुएला क्रूड खरीदा है। इसमें से 15 लाख बैरल आईओसी की पारादीप रिफाइनरी और पांच लाख बैरल एचपीसीएल की विशाखापत्तनम यूनिट के लिए है। प्रतिबंधों से पहले रिलायंस और आईओसी दोनों ही वेनेजुएला के नियमित खरीदार थे।

रिलायंस को मिला यह लाइसेंस भारतीय रिफाइनिंग क्षेत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है। सस्ते वेनेजुएला क्रूड की वापसी से न केवल रिलायंस की इनपुट लागत कम होगी, बल्कि यह भारतीय कंपनियों को रूसी तेल पर निर्भरता कम करने और अमेरिकी व्यापार संबंधों को संतुलित करने में भी मदद करेगा। अब बाजार की नजर इस पर होगी कि आने वाली तिमाहियों में यह क्रूड रिलायंस के वित्तीय नतीजों को कैसे प्रभावित करता है।



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