शेख हसीना के हटने के बाद बांग्लादेश कहां-कितनी चुनौतियों में घिरा, भारत से रिश्तों में क्या बदला?

शेख हसीना के हटने के बाद बांग्लादेश कहां-कितनी चुनौतियों में घिरा, भारत से रिश्तों में क्या बदला?

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना आज से ठीक दो साल पहले अपने देश में उग्र हुए छात्र आंदोलन के बाद अपना देश छोड़कर भारत में शरण लेने को मजबूर हुई थीं। हालांकि उन्होंने 2026 के अंत तक बांग्लादेश लौटने का एलान किया है। इस बीच यह जानना अहम है कि आखिर बीते दो साल में बांग्लादेश में स्थितियां कितनी बदल चुकी हैं और भारत के साथ पड़ोसी मुल्क के रिश्ते किस मोड़ पर हैं। आइये जानते हैं…

5 अगस्त 2024, यह वह तारीख थी, जब बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ छात्रों का आंदोलन इस कदर बढ़ चुका था कि इसे नियंत्रित करना मुश्किल हो गया। प्रदर्शनों के दौरान फैली हिंसा और युवाओं के सरकार के खिलाफ गुस्से के चलते आखिरकार शेख हसीना को देश छोड़कर भागना पड़ा। अपनी जान बचाने के लिए उन्हें भारत में शरण तक लेनी पड़ी। तब से लेकर अब तक पद्मा नदी में काफी पानी बह चुका है। इस दौरान बांग्लादेश में दो सरकारें बन चुकीं, जिनमें एक अंतरिम सरकार और एक जनता की ओर से चुना हुआ शासन है। दोनों ही सरकारों की तरफ से आवाम के लिए कई बड़े फैसले लिए जा चुके हैं और यह देश दो साल पहले की क्रांति से काफी आगे बढ़ चुका है।

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर बांग्लादेश में बीते दो साल में हालात कैसे बदले हैं? कौन सी चुनौतियां वहां अब भी बरकरार हैं? मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार और चुनी हुई पूर्णकालिक सरकार के दौर में बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में क्या अंतर आया? इसके अलावा शेख हसीना को लेकर मौजूदा समय में बांग्लादेश में क्या रुख है? आइये जानते हैं…

बांग्लादेश में बीते दो साल में हालात कैसे बदले हैं?

बांग्लादेश में जुलाई 2024 की क्रांति के बाद से बीते दो वर्षों में कई बड़े बदलाव आए हैं…

1. राजनीतिक बदलावों की बयार

शेख हसीना का शासन खत्म हुआ 
5 अगस्त 2024 को छात्रों (जेन-जी) के नेतृत्व में आरक्षण के मुद्दे पर भड़का जन-आक्रोश शेख हसीना सरकार की सख्ती के बाद नियंत्रण के बाहर हो गया। इसका असर यह हुआ कि हसीना को प्रधानमंत्री होने के बावजूद सैन्य विमान से भारत भागना पड़ा। इसके साथ ही उनके 15 साल के सत्तावादी शासन का अंत हो गया। 

अंतरिम सरकार का हुआ गठन
शेख हसीना के देश छोड़कर जाने के बाद नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार का गठन हुआ, जिसने देश में स्थिरता बहाल करने और संस्थागत सुधारों की नींव रखने की कोशिश की। हालांकि, लगातार बढ़ती धार्मिक हिंसा और शेख हसीना के राजनीतिक दल और कार्यकर्ताओं के खिलाफ बर्बर हमलों को रोकने में वे असफल रहे, जिसकी काफी आलोचना हुई। इसके अलावा उन्होंने बांग्लादेश को भारत से दूर करने में भी बड़ी भूमिका निभाई।

चुनाव के बाद बनी पूर्णकालिक सरकार
12 फरवरी 2026 को देश में संसदीय चुनाव कराए गए, जिन्हें पिछले दो दशकों में सबसे विश्वसनीय चुनाव माना गया। हालांकि, इसमें भी शेख हसीना की आवामी लीग को प्रतिबंधित कर दिया गया। यानी उनका एक भी प्रत्याशी चुनाव मैदान में नहीं उतर पाया, जिससे बांग्लादेश के इन चुनावों की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल उठे।

बीएनपी की सत्ता में वापसी
इन चुनावों में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनेलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने 300 में से 209 सीटें जीतकर दो-तिहाई बहुमत हासिल किया और सरकार बनाई। जमात-ए-इस्लामी 68 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल बनी, जबकि छात्रों की नई नेशनल सिटीजन्स पार्टी (एनसीपी) को छह सीटें मिलीं। 

2. सांविधानिक सुधारों की कोशिश

मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार की तरफ से एक जुलाई नेशनल चार्टर तैयार किया गया था। इसमें प्रधानमंत्री के कार्यकाल को अधिकतम 10 वर्ष करने, न्यायपालिका और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को बढ़ाने और दो सदन वाली संसद जैसे बड़े सुधार शामिल थे। हालांकि, इसी दौरान बांग्लादेश में आवामी लीग पार्टी को प्रतिबंधित करने का फैसला किया गया और उसके प्रत्याशियों के चुनाव लड़ने तक पर रोक लगा दी, जिससे यूनुस की निष्पक्ष छवि को बड़ा झटका लगा। 

3. आर्थिक उतार-चढ़ाव का दौर

शेख हसीना के जाने के समय देश की अर्थव्यवस्था बेहद खराब स्थिति में थी। मुद्रास्फीति करीब 12% थी और विदेशी मुद्रा भंडार घटकर 20 अरब डॉलर रह गया था। उधर मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने बैंकों के बोर्ड भंग किए, मुद्रा विनिमय दर को बाजार आधारित किया और आईएमएम और विश्व बैंक से वित्तीय कर्ज लिया। हालांकि, इसके बावजूद पहले अमेरिका की तरफ से लगाए गए आयात शुल्क और फिर अमेरिका-ईरान युद्ध से बांग्लादेश को भारी नुकसान हुआ है। 


बांग्लादेश में बदलावों के बीच कौन सी चुनौतियां उभरीं/बरकरार रहीं?

बांग्लादेश में जुलाई 2024 की क्रांति के बाद शासन तो बदल गया, लेकिन इस बदलाव के बीच कई पुरानी चुनौतियां बरकरार रही हैं और कुछ नए गंभीर आर्थिक और राजनीतिक संकट भी उभर कर सामने आए हैं।

1. व्यवस्था परिवर्तन और सांविधानिक सुधारों की चुनौती

द डिप्लोमैट मैगजीन की रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश में शासक भले ही बदल गए हों, लेकिन पूरी व्यवस्था को बदलने का ऐतिहासिक और बुनियादी काम दो साल बाद भी अधूरा है। फरवरी 2026 के चुनावों के साथ हुए जनमत संग्रह में लगभग 68% जनता ने इन सुधारों के पक्ष में हां का वोट दिया था। लेकिन सत्ता में आने के बाद बीएनपी ने इस जनमत संग्रह के नतीजों को लागू करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई है और संविधान सुधार परिषद की शपथ लेने से इनकार कर दिया। 

2. न्यायपालिका पर नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश

बीएनपी न्यायपालिका पर अपना कार्यकारी नियंत्रण और प्रभाव बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट के अलग सचिवालय के उस प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल रही है, जिसका उसने पहले समर्थन किया था। इसी वजह से जुलाई क्रांति के युवा नेताओं की ओर से बनाई गई पार्टी- एनसीपी ने इसे आधी क्रांति करार दिया है और वे बीएनपी को पूर्ण क्रांति के रास्ते में एक बाधा बता रहे हैं।


3. गैर-बराबरी वाली राजनीति और भविष्य का संकट

फरवरी 2026 के चुनावों में अवामी लीग को बाहर रखने के बाद, अब बीएनपी सरकार ने इस प्रतिबंध को औपचारिक रूप दे दिया है। यह स्थिति देश के पुराने राजनीतिक ढर्रे वाली है, जो कि पहले भी देखी गई है, जब विपक्षी दलों को समान अवसर नहीं मिलते थे। विशेषज्ञों के मुताबिक, अवामी लीग पर लगा पूर्ण प्रतिबंध भविष्य में एक नए राजनीतिक संकट की नींव रख सकता है।


4. आर्थिक झटकों से उबरने में मुश्किलें

कई आर्थिक संकटों से घिरा देश: फरवरी 2026 के अंत में अमेरिका-ईरान युद्ध शुरू होने से बांग्लादेश की संभलती अर्थव्यवस्था को भारी झटका लगा। होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने और तेल की कीमतें बढ़ने से बांग्लादेश को खाद के लिए वियतनाम, मलेशिया और ब्रुनेई जैसे देशों पर निर्भर होना पड़ रहा है।

औद्योगिक उत्पादन में गिरावट: शेख हसीना के बांग्लादेश से जाने के बाद यहां औद्योगिक उत्पादन सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। दरअसल, जुलनाई क्रांति के दौरान हुए प्रदर्शनों के दौरान हिंसा की वजह से उद्योग लंबे समय तक बंद रहे। इसके बाद अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने और अलग-अलग देशों पर टैरिफ लगाए जाने का बड़ा असर बांग्लादेश के निर्यात पर पड़ा। आलम यह हुआ कि देश का कपड़ा उद्योग, जिसका एक समय दुनिया में डंका बजता था, वह बुरी तरह प्रभावित हुआ।  

इतना ही नहीं हालिया अमेरिका-ईरान संघर्ष और होर्मुज के बंद होने की वजह से बांग्लादेश में तेल-गैस की भारी कमी हो गई। इससे वहां तेल की राशनिंग शुरू की गई और आम उपभोक्ताओं को महंगा तेल लेना पड़ रहा है। इसके अलावा गैस की कमी के चलते मार्च 2026 में कई खाद कारखाने बंद करने पड़े, ताकि बिजली बनाई जा सके। नतीजतन देश के सबसे बड़े निर्यात उद्योग- रेडीमेड गारमेंट्स का उत्पादन गिरकर उसकी क्षमता का 30 से 60 प्रतिशत ही रह गया है।

महंगाई और खाद्य असुरक्षा का खतरा: बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के जाने के बाद भी महंगाई दर लगातार ऊंची रही है। इसके अलावा खाद्य संकट भी बढ़ा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर जुलाई में शुरू होने वाले धान सीजन से पहले खाद का स्टॉक नहीं सुधारा गया, तो चावल की पैदावार में 10% की गिरावट आ सकती है, जिससे चावल की कीमतें 8 से 10% तक बढ़ जाएंगी। इस संकट ने देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर एक बार फिर भारी दबाव बना दिया है। इसके अलावा जुलाई में शुरू होने वाले धान सीजन में फसल खराब होने का खतरा पैदा हो गया है।


बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में कितना बदलाव आया?

1. शेख हसीना के कार्यकाल के दौरान अंतरराष्ट्रीय रिश्ते

शेख हसीना के कार्यकाल (2009–2024) के दौरान भारत ने उनके शासन में भारी राजनीतिक निवेश किया था। हसीना की नीतियां भी मुख्य रूप से भारत-केंद्रित थीं। उनके शासनकाल में पाकिस्तान जैसे पारंपरिक प्रतिद्वंद्वियों के साथ संबंधों को सुधारने की कोशिश नहीं की गई। आवामी लीग की पहली मांग ही यही थी कि पाकिस्तान संबंध सुधारने के लिए पहले पूर्वी पाकिस्तान में किए गए अपने जुल्मों के लिए माफी मांगे।

2. शेख हसीना के जाने के बाद अंतरिम सरकार का दौर

5 अगस्त 2024 को शेख हसीना के अचानक भारत जाने और वहां शरण लेने के कारण दोनों पड़ोसियों के बीच कूटनीतिक खटास पैदा हो गई। बांग्लादेश की नई सरकार ने भारत से हसीना के प्रत्यर्पण की औपचारिक मांग भी की, जिसकी भारत ने समीक्षा करने की बात कही।

उधर बांग्लादेश से शेख हसीना के जाने के बाद हिंदू अल्पसंख्यकों पर हुए हमलों और हिंदू नेता चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी ने भारत-बांग्लादेश के बीच राजनयिक तनाव को और गहरा कर दिया। इन समस्याओं को लेकर यूनुस की अंतरिम सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया।

इतना ही नहीं, अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने पाकिस्तान से रिश्ते बढ़ाने पर जोर दिया। यहां तक कि उससे व्यापार और सैन्य समझौतों तक पर जोर दिया। इसका बांग्लादेश में खासा विरोध भी हुआ। 

3. तारिक रहमान की चुनी हुई सरकार के तहत नए बदलाव

मोहम्मद यूनुस की भारत विरोधी नीति के उलट, प्रधानमंत्री तारिक रहमान के नेतृत्व वाली नई बीएनपी सरकार ने भारत के साथ रिश्ते सामान्य करने पर जोर दिया। हालांकि, शेख हसीना की तरह वे भारत से कुछ दूरी बनाते चले आ रहे हैं। तारिक ने अपनी विदेश नीति का दायरा बढ़ाया है। उनकी सरकारचीन के साथ अपने संबंधों को व्यापक बना रही है, वहीं भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों को पुनर्जीवित कर रही है। इसके साथ ही पाकिस्तान के साथ संबंध बढ़ाने की यूनुस की कोशिशों को भी आगे बढ़ा रही है। इसके अलावा तारिक ने पश्चिमी देशों के साथ भी अच्छे संबंध बनाए हुए हैं।

अमेरिकी थिंक टैंक कार्नेगी एंडाओमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के मुताबिक, यूनुस की अंतरिम सरकार के भारत विरोधी रवैये के बीच बीएनपी और भारत की सत्तारूढ़ भाजपा के बीच राजनीतिक दल के स्तर पर आपसी समझ विकसित हुई, जिसने चुनाव के बाद दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को तेजी से पटरी पर लाने में मदद की। यह आपसी समझ इतनी प्रभावी रही कि अप्रैल 2026 में असम और पश्चिम बंगाल के चुनावों के दौरान होने वाली बांग्लादेश का मुद्दा दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित नहीं कर सका।

थिंक टैंक के मुताबिक, बीएनपी की रूढ़िवादी धर्मनिरपेक्षता, जो बांग्लादेशी हिंदू अल्पसंख्यकों के अधिकारों की बात करती है, भाजपा के राष्ट्रवाद के साथ जुड़ाव का एक अहम बिंदु बनी है। दोनों दल मिलकर यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि बांग्लादेश की कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी एक नियंत्रित राजनीतिक शक्ति ही बनी रहे। इसी सुधार की दिशा में भारत ने भाजपा नेता दिनेश त्रिवेदी को ढाका में अपना नया उच्चायुक्त नियुक्त किया है।

दूसरी तरफ भारत और बांग्लादेश के सुधरते संबंधों के प्रतीक के रूप में, मोदी सरकार ने सितंबर 2026 में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री तारिक रहमान को विशेष अतिथि (बिम्सटेक के अध्यक्ष के रूप में) आमंत्रित किया है, जहां प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी नरेंद्र मोदी के साथ पहली सीधी मुलाकात होना लगभग तय है।

शेख हसीना के भारत में होने पर बांग्लादेश में अब क्या रुख?

1. मौत की सजा पा चुकी हैं शेख हसीना
शेख हसीना के खिलाफ बांग्लादेश में उनकी गैरमौजूदगी में कानूनी प्रक्रियाएं जारी रहीं। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के शासन के दौरान नवंबर 2025 में बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (आईसीटी) ने जुलाई 2024 के जन-आंदोलन के दौरान मानवता के खिलाफ किए गए अपराधों और नरसंहार के लिए शेख हसीना को उनकी अनुपस्थिति में मौत की सजा सुनाई है। इसके अलावा उन पर हत्या, भ्रष्टाचार और मानवाधिकारों के उल्लंघन से जुड़े 100 से अधिक मामले दर्ज हैं। शेख हसीना ने इन अदालती फैसलों को कानून के मुखौटे में राजनीतिक प्रतिशोध कहा है।

2. शेख हसीना का बांग्लादेश लौटने के एलान पर तीखी प्रतिक्रिया
शेख हसीना ने हाल ही में घोषणा की है कि वह इस साल दिसंबर तक बांग्लादेश लौटकर अदालतों के सामने आत्मसमर्पण करना चाहती हैं। इस घोषणा पर बांग्लादेश प्रशासन का रुख स्पष्ट और बेहद सख्त है।

  • बांग्लादेश के कानून मंत्री एम. असदुज्जैन ने साफ किया है कि देश में कदम रखते ही उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाएगा। 
  • विदेश राज्य मंत्री शमा ओबायद ने कहा, “शेख हसीना चाहे भारत में आत्मसमर्पण करें या बांग्लादेश में, उन्हें सबसे पहले जेल जाना होगा।” 
  • उपमंत्री इशराक हुसैन ने उनके लौटने के दावे को राजनीतिक स्टंट करार दिया, जो सिर्फ उनके निराश कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए है।

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