डेढ़ साल में 13.1% गिरा रुपया: अब पलट सकता है रुख; आरबीआई डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने बताई वजह

डेढ़ साल में 13.1% गिरा रुपया: अब पलट सकता है रुख; आरबीआई डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने बताई वजह

आरबीआई की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने कहा है कि पिछले डेढ़ साल में रुपये की 13.1 फीसदी गिरावट अस्थायी हो सकती है और मौजूदा स्तर से रुपये के मजबूत होने की गुंजाइश है। उनका कहना है कि सेवाओं के निर्यात, विदेशों से आने वाले धन, बढ़ते वस्तु निर्यात और तेल आयात पर घटती निर्भरता से भारत के बाहरी खाते को मजबूती मिलेगी। साथ ही, पूंजी खाते में सुधार और विदेशी पूंजी के बढ़ते प्रवाह से भी रुपये को सहारा मिल सकता है।

भारतीय रिजर्व बैंक की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने कहा है कि रुपये के मौजूदा स्तर से सिर्फ स्थिर होने ही नहीं, बल्कि मजबूत होने की भी गुंजाइश है। उनका कहना है कि पिछले करीब डेढ़ साल में रुपये में आई 13.1 फीसदी की गिरावट अस्थायी घटना हो सकती है। गुप्ता ने बुधवार को मुंबई में 13वें एसबीआई बैंकिंग एंड इकोनॉमिक्स कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए यह बात कही।

पूनम गुप्ता ने यह भी कहा कि 31 मार्च 2025 से 16 सितंबर 2026 के बीच रुपये में 13.1 फीसदी की संचयी गिरावट आई है। गुप्ता के मुताबिक, इसे रुपये का जरूरत से ज्यादा कमजोर होना यानी ‘ओवरकरेक्शन’ भी माना जा सकता है। उन्होंने कहा कि पूंजी प्रवाह से जुड़े उपायों की घोषणा के समय बाजार विश्लेषक भी रुपये में मजबूती की उम्मीद कर रहे थे।

भुगतान संतुलन में सुधार से रुपये को कैसे फायदा होगा?
डिप्टी गवर्नर ने कहा कि भारत का भुगतान संतुलन पिछले दो वित्त वर्षों में नकारात्मक रहा है। वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 5 अरब डॉलर और 2025-26 में 23.6 अरब डॉलर का नकारात्मक भुगतान संतुलन दर्ज किया गया। इसकी एक वजह यह रही कि पूंजी खाते का अधिशेष चालू खाते के घाटे से कम रहा। आने वाले वर्षों में भारत का चालू खाता घाटा और कम होने की उम्मीद है। सेवाओं का निर्यात और विदेशों से आने वाला पैसा भारत की मजबूत पारंपरिक ताकत बने हुए हैं। वस्तुओं के निर्यात में बढ़ती सफलता भारत की नई ताकत के तौर पर उभर रही है। हाल के मुक्त व्यापार समझौतों का सकारात्मक असर और अनुकूल विनिमय दर भी निर्यात को सहारा दे सकती है।

तेल आयात घटने से रुपये की स्थिति कैसे सुधरेगी?
पूनम गुप्ता ने कहा कि भारत की तेल आयात पर निर्भरता आने वाले समय में कम हो सकती है। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के इस्तेमाल और देश में अपने तेल भंडार खोजने के प्रयासों से जीडीपी के मुकाबले तेल की मांग में कमी आने की उम्मीद है। इससे भारत के बाहरी खाते पर दबाव कम हो सकता है।

हालांकि, हाल में तेल और सोने की कीमतों में आए झटकों ने चालू खाता घाटे को अस्थायी रूप से बढ़ाया है। गुप्ता के मुताबिक, सेवाओं का शुद्ध निर्यात और विदेशों से आने वाला पैसा इतना बड़ा और मजबूत स्रोत है कि वह वस्तुओं के व्यापार घाटे को संभाल सकता है और चालू खाता घाटे को जीडीपी के एक फीसदी से नीचे रख सकता है।

विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ने की उम्मीद क्यों?
डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने कहा कि पूंजी खाते की स्थिति मौजूदा वित्त वर्ष के बाद के हिस्से में ज्यादा अनुकूल हो सकती है। उन्होंने इसके लिए भारत के मजबूत घरेलू आर्थिक आधार, वास्तविक और नाममात्र जीडीपी की ऊंची वृद्धि, घरेलू निवेश चक्र और बैंकों व कंपनियों की स्वस्थ बैलेंस शीट को अहम वजह बताया।

उन्होंने कहा कि दूसरे बाजारों में ऊंचे मूल्यांकन और एआई आधारित निवेश में संतृप्ति भारत के लिए पूंजी आकर्षित करने का अवसर बन सकती है। भारत में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश यानी एफडीआई में बढ़ोतरी भी पूंजी प्रवाह को सहारा दे सकती है। भारतीय बॉन्ड के आगे चलकर ज्यादा वैश्विक सूचकांकों में शामिल होने से भी विदेशी निवेश बढ़ सकता है।

आरबीआई के पूंजी प्रवाह उपायों से क्या फायदा हुआ?
गुप्ता ने कहा कि जून में लागू किए गए विशेष पूंजी प्रवाह उपायों से इस साल भारत को महत्वपूर्ण भुगतान संतुलन अधिशेष मिला है। यह दिखाता है कि भारत बहुत कम ‘कंट्री प्रीमियम’ पर बड़े पूंजी प्रवाह को आकर्षित करने की क्षमता रखता है।

उन्होंने कहा कि विदेशी मुद्रा बाजार में व्यवस्थित परिस्थितियां बनाए रखने के लिए आरबीआई प्रतिबद्ध है और उसके पास भारत के चालू खाता घाटे या शुद्ध भुगतान संतुलन घाटे की जरूरतों को पूरा करने की पर्याप्त क्षमता है। गुप्ता ने कहा कि भारत का चालू खाता घाटा समय के साथ कम हुआ है और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए आम तौर पर उचित माने जाने वाले स्तर से काफी नीचे बना हुआ है।

administrator

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *