क्रिस्टोफर नोलन निर्देशित हॉलीवुड फिल्म ‘द ओडिसी’ की चर्चा काफी दिनों से सोशल मीडिया पर बनी हुई थी। यह फिल्म इस शुक्रवार को भारतीय सिनेमाघरों में रिलीज हाेगी। पढ़िए, फिल्म ‘द ओडिसी’ का रिव्यू।
जब भी क्रिस्टोफर नोलन की नई फिल्म रिलीज होती है तो दर्शकों की उम्मीदें अपने आप बढ़ जाती हैं। इसकी वजह उनकी पिछली फिल्में हैं। ‘द डार्क नाइट’ से उन्होंने सुपरहीरो फिल्मों का अंदाज बदल दिया। ‘इंसेप्शन’ में सपनों की दुनिया दिखाई। ‘इंटरस्टेलर’ में अंतरिक्ष के बीच रिश्तों की कहानी सुनाई। वहीं ‘ओपेनहाइमर’ जैसी गंभीर फिल्म को भी दुनियाभर के दर्शकों तक पहुंचाया।
इस बार नोलन, होमर की हजारों साल पुरानी कहानी ‘द ओडिसी’ लेकर आए हैं। यह सिर्फ एक पौराणिक कहानी नहीं है। यह घर लौटने की जिद, उम्मीद और संघर्ष की कहानी है। फिल्म कई जगह चौंकाती है। कई जगह रोमांच बढ़ाती है। कुछ सीन लंबे समय तक याद रहते हैं। हालांकि फिल्म पूरी तरह बेदाग नहीं है। खासकर एक किरदार की लिखावट थोड़ी कमजोर लगती है।
कहानी
ट्रॉय युद्ध खत्म हो चुका है। इथाका का राजा ओडिसियस (मैट डेमन) अब अपने घर लौटना चाहता है लेकिन यह सफर बिल्कुल आसान नहीं है। समुद्र में उठते तूफान उसका रास्ता रोकते हैं। समुद्र के देवता पोसाइडन भी उसके खिलाफ हैं। हर कदम पर नई मुसीबत उसका इंतजार कर रही है।
रास्ते में उसका सामना एक आंख वाले विशालकाय साइक्लोप्स पॉलीफेमस से होता है। जादूगरनी सर्सी उसे रोकने की कोशिश करती है। सायरन की रहस्यमयी आवाजें उसे मौत की तरफ खींचती हैं। एक खतरनाक समुद्री भंवर भी उसके रास्ते में आता है।
वहीं अप्सरा कैलिप्सो उसे कई साल तक अपने द्वीप पर रोककर रखती है। इन सब मुश्किलों में ओडिसियस अपने साथियों को भी खो देता है। फिर भी वह हार नहीं मानता। उसके मन में सिर्फ एक ही बात रहती है कि किसी भी तरह अपने घर पहुंचना।
उधर इथाका में उसकी पत्नी पेनेलोप (ऐन हैथवे) वर्षों से उसका इंतजार कर रही है। कई लोग उससे शादी कर राजा बनना चाहते हैं। लेकिन पेनेलोप उन्हें टालती रहती है। बेटा टेलीमेकस (टॉम हॉलैंड) भी अब बड़ा हो चुका है। वह अपने पिता की तलाश में निकल पड़ता है।
कई वर्षों बाद जब ओडिसियस अपने राज्य लौटता है तो कोई उसे पहचान नहीं पाता। वह एक बूढ़े भिखारी का वेश बनाकर महल में पहुंचता है। इसके बाद कहानी नया मोड़ लेती है। अपने बेटे और कुछ वफादार साथियों की मदद से वह अपना खोया हुआ राज्य वापस पाने की कोशिश करता है।
आखिर वह इसमें कामयाब होता है या नहीं, यही फिल्म का सबसे दिलचस्प हिस्सा है। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका रोमांच है। थोड़ी-थोड़ी देर बाद कहानी नया मोड़ लेती है। यही वजह है कि करीब तीन घंटे की फिल्म भी आपको बांधे रखती है।

फिल्म ‘द ओडिसी’ रिव्यू – फोटो : X
अभिनय
मैट डेमन पूरी फिल्म की जान हैं। उन्होंने ओडिसियस के संघर्ष, थकान और घर लौटने की बेचैनी को शानदार तरीके से पर्दे पर उतारा है। कई जगह सिर्फ उनके चेहरे के भाव ही काफी हैं। पूरी फिल्म का भावनात्मक भार भी उन्हीं के कंधों पर है और वह इसे बखूबी संभालते हैं।
ऐन हैथवे का स्क्रीन टाइम ज्यादा नहीं है। फिर भी वह अपनी छाप छोड़ती हैं। उनके और मैट डेमन के बीच के दृश्य फिल्म को भावनात्मक गहराई देते हैं। टॉम हॉलैंड से काफी उम्मीद थी। उनका किरदार कहानी का अहम हिस्सा है। लेकिन फिल्म यहीं सबसे ज्यादा कमजोर पड़ती है। टेलीमेकस का ट्रैक ओडिसियस की रोमांचक यात्रा के सामने फीका लगता है। टॉम अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते हैं लेकिन किरदार की लिखावट उन्हें चमकने का मौका नहीं देती। नतीजा यह होता है कि फिल्म का भावनात्मक पक्ष उतना असर नहीं छोड़ पाता, जितनी उम्मीद थी।
रॉबर्ट पैटिंसन अपने नेगेटिव किरदार में दमदार नजर आते हैं। जेंडाया भी एथेना के रोल में अच्छी लगती हैं। उनका किरदार ओडिसियस की यात्रा में अहम भूमिका निभाता है। चार्लीज थेरॉन, लुपिता न्योंगो और जॉन बर्नथल भी अपने हिस्से का काम ईमानदारी से करते हैं।
निर्देशन
क्रिस्टोफर नोलन की खूबी यही है कि वह बड़े कैनवास पर भी कहानी को बिखरने नहीं देते। ‘द ओडिसी’ में भी यही नजर आता है। करीब तीन घंटे की फिल्म होने के बावजूद वह दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखते हैं।
अच्छी बात यह है कि फिल्म समझने के लिए होमर की किताब पढ़ना जरूरी नहीं है। अगर आपने ‘द ओडिसी’ के बारे में पहले कभी नहीं सुना, तब भी कहानी आसानी से समझ आती है। नोलन ने इसे आसान और सीधे अंदाज में पेश किया है।
फिल्म का विजुअल ट्रीटमेंट इसकी सबसे बड़ी ताकत है। समुद्र की ऊंची लहरें, विशाल जहाज, पहाड़, द्वीप और युद्ध के दृश्य बड़े पर्दे पर शानदार लगते हैं। कई बार ऐसा लगता है जैसे आप भी ओडिसियस के साथ उसी सफर पर निकल पड़े हों।
नोलन सिर्फ बड़े सीन्स दिखाने तक नहीं रुकते हैं। वह रिश्तों, परिवार, उम्मीद और घर लौटने की चाह को भी बराबर जगह देते हैं। यही वजह है कि यह फिल्म सिर्फ एक एडवेंचर फिल्म बनकर नहीं रह जाती। यह एक इंसान के संघर्ष और उसके धैर्य की कहानी भी बन जाती है।
तकनीकी पक्ष
तकनीकी तौर पर फिल्म काफी मजबूत है। कैमरा वर्क इसकी सबसे बड़ी ताकत है। हर फ्रेम पर मेहनत साफ दिखाई देती है। प्रोडक्शन डिजाइन भी प्रभावित करता है। जहाजों से लेकर महलों तक, हर सेट में बारीकी नजर आती है।
जरूरत से ज्यादा CGI का इस्तेमाल नहीं किया गया है। यही वजह है कि कई सीन्स और ज्यादा रियल लगते हैं। खास तौर पर, साइक्लोप्स और सर्सी वाले सीन्स लंबे समय तक याद रहते हैं। इन सीन्स में नोलन का काम सबसे ज्यादा प्रभावित करता है।
कैमरा वर्क और साउंड डिजाइन मिलकर रोमांच बढ़ा देते हैं। यही वजह है कि ये सीन्स बड़े पर्दे पर अलग असर छोड़ते हैं। लोकेशन का चुनाव शानदार है। समुद्र और पहाड़ बड़े पर्दे पर अलग ही असर छोड़ते हैं।
अगर मौका मिले तो यह फिल्म आईमैक्स या बड़े पर्दे पर ही देखनी चाहिए। बैकग्राउंड स्कोर भी फिल्म का अच्छा साथ देता है। जहां जरूरत होती है, वहां रोमांच बढ़ाता है। इमोशनल दृश्यों में यह कहानी पर हावी नहीं होता।
स्क्रीनप्ले
फिल्म का स्क्रीनप्ले इसकी बड़ी ताकत है। जब तक कहानी ओडिसियस के सफर पर रहती है तो फिल्म लगातार बांधे रखती है। कुछ-कुछ मिनट बाद नया मोड़ आता है। दर्शक आगे की कहानी जानना चाहता है।
हालांकि जैसे-जैसे कहानी टेलीमेकस के ट्रैक पर ज्यादा समय देती है, रफ्तार थोड़ी धीमी महसूस होती है। यह हिस्सा खराब नहीं है। लेकिन ओडिसियस की जर्नी जितना असर भी नहीं छोड़ता, अगर इस हिस्से को थोड़ा और मजबूत लिखा जाता तो फिल्म और बेहतर बन सकती थी।
देखें या नहीं?
अगर आप क्रिस्टोफर नोलन की फिल्में पसंद करते हैं तो ‘द ओडिसी’ जरूर देखें। अगर आपको बड़े पैमाने पर बनी एडवेंचर फिल्में पसंद हैं, तब भी यह आपको निराश नहीं करेगी।
हां, फिल्म में कुछ कमियां जरूर हैं। लेकिन वे इसके अच्छे पक्ष पर भारी नहीं पड़ती हैं। अगर आपको बड़े पर्दे पर बनी भव्य कहानियां पसंद हैं, तो ‘द ओडिसी’ जरूर देखनी चाहिए।



