ईरान से समझौता किए बिना अमेरिका लौटे वेंस: किन मुद्दों पर नहीं बन पाई सहमति, अब आगे क्या करेंगे ट्रंप?

ईरान से समझौता किए बिना अमेरिका लौटे वेंस: किन मुद्दों पर नहीं बन पाई सहमति, अब आगे क्या करेंगे ट्रंप?

ईरान और अमेरिका के बीच शांति की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है ईरान से समझौता किए बिना अमेरिका लौटे वेंस। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में चली 21 घंटे की बातचीत बिना किसी समझौते के खत्म हो गई। जहां अमेरिका लगातार ईरान से अपने परमाणु संवर्धन कार्यक्रम को खत्म करने की और होर्मुज को खोलने की मांग कर रहा था, वहीं ईरान भी अपने ऊपर लगे प्रतिबंधों को हटाने और मुआवजे की मांग पर अड़ा रहा। नतीजतन दोनों ही पक्ष किसी समझौते पर नहीं पहुंचे। 

अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते का सीजफायर लागू है। इस बीच पाकिस्तान में दोनों पक्षों के बीच सीधी वार्ता का आयोजन किया गया। हालांकि, इसमें अमेरिका-ईरान की तरफ से युद्ध को स्थायी तौर पर रोकने के लिए कोई समझौता नहीं किया जा सका। इसके बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व वाला प्रतिनिधिमंडल और ईरान के संसद के स्पीकर बाघेर गालिबाफ के नेतृत्व वाला प्रतिनिधिमंडल अपने-अपने देश लौट गए। अब चूंकि दोनों पक्षों के बीच वार्ता नाकाम हो चुकी है और ईरान के परमाणु कार्यक्रम से लेकर होर्मुज जलडमरूमध्य खुलवाने तक पर कोई सहमति नहीं बन पाई है, ऐसे में यह अंदाजा लगाया जा रहा है कि अमेरिका अब अगला कदम क्या उठा सकता है। 

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर अमेरिका-ईरान के बीच पाकिस्तान में हुई वार्ता सफल क्यों नहीं हुई? अमेरिका की तरफ से ईरान को दिया आखिरी और सर्वश्रेष्ठ प्रस्ताव क्या रहा? अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप क्या करेंगे? आइये जानते हैं…

ईरान से समझौता किए बिना अमेरिका लौटे वेंस : अमेरिका-ईरान के बीच किन मुद्दों पर हुई बात?

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच 21 घंटे तक चली मध्यस्थता वार्ता में कई अहम और रणनीतिक मुद्दों पर चर्चा हुई। इनमें सबसे अहम मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज जलडमरूमध्य को जल्द से जल्द खुलवाने का रहा। 

ईरान का परमाणु कार्यक्रम: यह बातचीत का सबसे बड़ा और मुख्य मुद्दा था। अमेरिका ने स्पष्ट मांग रखी कि ईरान परमाणु हथियार विकसित न करने की प्रतिबद्धता जताए और उन सभी जल्द परमाणु हथियार बनाने के सभी जरियों को भी छोड़ दे। इसके साथ ही परमाणु सामग्री को हटाने पर भी जोर दिया गया। 

होर्मुज जलडमरूमध्य: इस अहम समुद्री मार्ग पर नियंत्रण एक प्रमुख विवाद का विषय था। अमेरिका ने इस जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की मांग की, जबकि ईरान के प्रस्ताव में इस पर ईरानी नियंत्रण की गारंटी मांगी गई थी।

युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई: बातचीत के दौरान ईरान ने हालिया अमेरिकी और इस्राइली हमलों की वजह से हुए नुकसान के लिए मुआवजे की मांग रखी। 

प्रतिबंधों से राहत और जब्त हुए फंड: ईरान ने अमेरिका की ओर से लगाए गए कई दशकों के प्रतिबंधों को हटाने और अपने विदेशी बैंकों में रोके गए फंड्स को वापस करने की भी शर्त रखी। 

युद्ध की पूरी तरह से अंत: ईरान ने क्षेत्र में और अपने खिलाफ चल रहे युद्ध को पूरी तरह और औपचारिक रूप से खत्म करने की गारंटी भी मांगी।

अमेरिका-ईरान के बीच पाकिस्तान में हुई वार्ता सफल क्यों नहीं हुई?

1. परमाणु कार्यक्रम को स्थायी रूप से बंद करने पर असहमति
वार्ता के टूटने का सबसे बड़ा कारण ईरान का परमाणु कार्यक्रम था। दरअसल, अमेरिका ने जहां ईरान के परमाणु संवर्धन कार्यक्रम को खत्म करने की मांग रख दी तो वहीं ईरान ने अपनी परमाणु सामग्री को नष्ट करने और अपनी ही धरती पर यूरेनियम संवर्धन के अधिकार को स्थायी रूप से छोड़ने से स्पष्ट इनकार कर दिया। ईरान का तर्क था कि परमाणु अप्रसार संधि के तहत परमाणु संवर्धन करना उसका अधिकार है। ईरान कुछ वर्षों के लिए अपने परमाणु संचालन को निलंबित करने की पेशकश कर रहा था, लेकिन इसे पूरी तरह से समाप्त करने के लिए तैयार नहीं था।

2. होर्मुज जलडमरूमध्य में रियायत पर भी सहमति नहीं
अमेरिका के 15-सूत्रीय प्रस्ताव में इस महत्वपूर्ण जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की मांग शामिल थी। इसके उलट ईरान की मांग थी कि इस समुद्री मार्ग पर उसका नियंत्रण सुनिश्चित किया जाए। ईरान ने स्पष्ट किया कि जब तक अमेरिका के साथ कोई उचित समझौता नहीं हो जाता, तब तक वह इस मुद्दे पर मुफ्त में कोई रियायत नहीं देगा।

3. युद्ध की क्षतिपूर्ति और प्रतिबंधों से राहत
ईरान की अमेरिका-इस्राइल के हमलों में हुए मानवीय और ढाचांगत नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजा देने और प्रतिबंधों को हटाने की मांग को अमेरिका ने पूरी तरह से खारिज कर दिया और कहा कि प्रतिबंध केवल धीरे-धीरे (शर्तों के लागू होने पर) हटाए जा सकते हैं। 

4. प्रस्तावों को जरूरत से ज्यादा और अनुचित माना गया
अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने अमेरिकी प्रस्ताव को अपनी ओर से लचीला और अंतिम व सबसे अच्छा प्रस्ताव बताया था। इसके ठीक उलट ईरानी प्रतिनिधिमंडल और उनके अधिकारियों ने अमेरिका की इन शर्तों को अनुचित और अत्यधिक करार दिया। 

5. दोनों पक्षों में जीत का अहसास
विश्लेषकों के मुताबिक, इस विफलता का एक बड़ा कूटनीतिक कारण यह भी था कि दोनों ही देश खुद को 38 दिनों तक चले हालिया युद्ध का विजेता मान रहे थे और इसलिए कोई भी समझौता करने का रुख नहीं दिखा पाया। अमेरिका का मानना था कि उसने 13,000 से अधिक ईरानी ठिकानों पर बमबारी करके उसे पस्त कर दिया है और ईरान को अब हार मान लेनी चाहिए।

दूसरी ओर, ईरान का मानना था कि इतने भारी सैन्य हमलों को झेलकर बच निकलना और अमेरिका को फिर बातचीत की मेज पर आने को मजबूर करना उसकी जीत है। इससे उसका मनोबल और दृढ़ हो गया। ईरान का मानना था कि अमेरिका जमीनी हकीकत को स्वीकार नहीं कर रहा है और ईरान के पास इंतजार करने का समय है, इसलिए झुकने का कोई कारण नहीं है।

क्या था अमेरिका का अंतिम और सर्वश्रेष्ठ प्रस्ताव?

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के मुताबिक, उन्होंने ईरान के सामने तीन आधारभूत शर्तें रखी थीं। इनमें परमाणु संवर्धन पर दीर्घकालिक रोक लगाने, परमाणु हथियार बनाने के जरियों को खत्म करने और होर्मुज को विश्व व्यापार के लिए बिना किसी पूर्व-शर्त के खोलने की मांग शामिल थी। वेंस ने इसे ही अमेरिका की कुछ रेड लाइन्स (वे शर्तें, जिन पर कोई मोल-तोल नहीं हो सकता) बताया था। इसके साथ ही, प्रस्ताव में उन क्षेत्रों को भी स्पष्ट किया गया था जहां अमेरिका ईरान के साथ लचीला रुख अपनाने को तैयार था।

अमेरिका का मानना था कि उसने पूरी सद्भावना के साथ यह लचीला प्रस्ताव रखा था, जिसे उसने ईरान के सामने ‘स्वीकार या अस्वीकार’ करने के लिए अंतिम विकल्प के रूप में पेश किया था। हालांकि, ईरान ने परमाणु कार्यक्रम को स्थायी रूप से रोकने और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी अमेरिकी मांगों को अनुचित और अत्यधिक मानते हुए इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

अमेरिका-ईरान के बीच समझौता नहीं, अब आगे क्या?

इस्लामाबाद में वार्ता विफल होने के बाद आगे के घटनाक्रम को लेकर कई संभावनाएं और रणनीतिक विकल्प सामने आ रहे हैं।

1. सैन्य कार्रवाई और संघर्ष विराम खत्म होने का विकल्प
सबसे बड़ा खतरा युद्ध के फिर से शुरू होने का है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे दो हफ्ते के संघर्ष विराम का खात्मा 21 अप्रैल को होना है। कोई समझौता न होने की स्थिति में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर बड़े पैमाने पर सैन्य हमले फिर से शुरू करवा सकते हैं। माना जा रहा है कि अमेरिका इस बार अपनी पुरानी धमकियों के आधार पर ईरान में नागरिक ढांचों को नुकसान पहुंचाएंगा। जवाब में ईरान भी पश्चिम एशियाई देशों पर हमले कर सकता है।

2. ईरान पर नौसैनिक नाकेबंदी
अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने रविवार को अपने ट्रूथ सोशल प्लेटफॉर्म पर कहा कि वह होर्मुज से जहाजों की आवाजाही को रोक रहे हैं। इससे पहले एक लेख साझा कर उन्होंने यह स्पष्ट संकेत दिया था कि अमेरिका आने वाले समय में ईरान पर वेनेजुएला जैसी नौसैनिक नाकेबंदी लगाने के विकल्प पर विचार कर सकता है।

सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिकी नौसेना फारस की खाड़ी में मौजूद अपने युद्धपोतों की मदद से होर्मुज जलडमरूमध्य से अंदर जाने और बाहर आने वाले जहाजों को रोक सकती है, जिससे ईरान होर्मुज का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए कर ही नहीं पाएगा। हालांकि, ट्रंप का यह कदम क्षेत्र से होने वाले व्यापार को बुरी तरह प्रभावित करेगा और खाड़ी के देशों का व्यापार लगभग पूरी तरह बंद ह जाएगा। इतना ही नहीं दुनियाभर में अमेरिका के साथी देश, जो अभी तेल-गैस की आंशिक कमी से जूझ रहे हैं, वे स्थायी समस्या का शिकार हो सकते हैं। 

3. कूटनीति और आगे की बातचीत की संभावना
अमेरिका ने कूटनीतिक खिड़की को फिलहाल खुला रखा है और वेंस की तरफ से ईरान को दिए अंतिम और सबसे अच्छे प्रस्ताव पर ईरान के जवाब का इंतजार करने की बात कही है। ईरान के एक अधिकारी के मुताबिक, ईरान की अमेरिका के साथ अगले दौर की बातचीत की कोई योजना नहीं है, लेकिन दूसरी ओर ईरान के विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा है कि कूटनीति का रास्ता अभी पूरी तरह से बंद नहीं हुआ है।

एशिया-पैसिफिक फाउंडेशन के नॉन रेजिडेंट फेलो माइकल क्यूगलमैन का कहना है कि पाकिस्तान में इतने उच्च-स्तरीय अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का जाना ही बातचीत के प्रति वॉशिंगटन की गंभीरता को दर्शाता है, इसलिए भविष्य में और भी बातचीत हो सकती है, चाहे वह पाकिस्तान में हो या कहीं और।

4. वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर
अगर आगे भी कूटनीति नाकाम रहती है और युद्ध फिर से भड़कता है, तो इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था, आपूर्ति श्रृंखला और शेयर बाजारों पर बहुत गहरा नकारात्मक असर पड़ेगा। दुनिया की 20% तेल आपूर्ति को भारी खतरा है, युद्ध की वापसी से पेट्रोल की कीमतें और तेजी से बढ़ेंगी। इसके अलावा उर्वरक और सेमीकंडक्टर के निर्माण के लिए आवश्यक हीलियम जैसी महत्वपूर्ण चीजों की भारी कमी हो जाएगी, जिससे महंगाई में बेतहाशा बढ़ोतरी होने की आशंका है। भारत में भी खाड़ी देशों से होने वाली तेल-एलपीजी की आपूर्ति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ना तय है। 

administrator

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *