AI के दौर में बढ़ते डेटा सेंटर क्यों बताए जा रहे पर्यावरण के लिए खतरा, भारत पर इसका कैसा होगा असर?

AI के दौर में बढ़ते डेटा सेंटर क्यों बताए जा रहे पर्यावरण के लिए खतरा, भारत पर इसका कैसा होगा असर?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते इस्तेमाल के साथ भारत में डेटा सेंटर तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन इनके साथ पर्यावरणीय चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार अत्यधिक गर्मी, बढ़ती बिजली खपत और भारी जल उपयोग भविष्य में डेटा सेंटरों के लिए बड़ा जोखिम बन सकते हैं। आइए विस्तार से जानते हैं।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ दुनिया भर में बड़े-बड़े डेटा सेंटर बनाए जा रहे हैं। भारत भी इस दौड़ में पीछे नहीं है। सरकार और निजी कंपनियां अरबों डॉलर का निवेश आकर्षित कर रही हैं ताकि देश को एआई और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का वैश्विक केंद्र बनाया जा सके। इसी बीच एक रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि नए डेटा सेंटर भविष्य में जलवायु परिवर्तन से जुड़े गंभीर जोखिम का कारण बन सकते हैं।

आइए जानते हैं कि डेटा सेंटर क्या होते हैं और क्यों महत्वपूर्ण है? भारत में कितनी तेजी से बढ़ रहा है डेटा सेंटर उद्योग? भारत को लेकर रिपोर्ट में क्या दावा किया गया? गर्मी क्यों बन रही सबसे बड़ा खतरा? क्या खतरा केवल डाटा सेंटर तक सीमित है? जल संकट को लेकर क्या दावा? भारत में जल संकट की क्या स्थिति है?

डेटा सेंटर क्या होते हैं और क्यों महत्वपूर्ण हैं?

डेटा सेंटर ऐसे विशाल भवन होते हैं जहां लाखों सर्वर, कंप्यूटर और नेटवर्क उपकरण लगातार चलते रहते हैं। एआई मॉडल, क्लाउड सेवाएं, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, बैंकिंग सिस्टम और सरकारी डिजिटल सेवाएं इन्हीं पर निर्भर होती हैं।

चैटजीपीटी, जैमिनी जैसे एआई मॉडल, गूगल सर्च, नेटफ्लिक्स, अमेजन वेब सर्विसेज और माइक्रोसॉफ्ट एज्योर जैसी सेवाओं को चलाने के लिए अत्यधिक कंप्यूटिंग क्षमता की जरूरत होती है, जिसके कारण दुनिया भर में नए डेटा सेंटर तेजी से बनाए जा रहे हैं।

भारत में कितनी तेजी से बढ़ रहा है डेटा सेंटर उद्योग?

भारत में डेटा सेंटर उद्योग लगातार विस्तार कर रहा है। इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय के अनुसार, देश की कुल डेटा सेंटर क्षमता 2020 में लगभग 375 मेगावाट थी, जो 2025 तक बढ़कर करीब 1,500 मेगावाट हो गई है।

एआई विकास को समर्थन देने के लिए एआई कंप्यूट क्षमता ढांचे के तहत 14 सूचीबद्ध सेवा प्रदाताओं और डेटा सेंटरों के माध्यम से 38,231 जीपीयू उपलब्ध कराए गए हैं। इन्हें स्टार्टअप, शोधकर्ताओं, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य पात्र उपयोगकर्ताओं को औसतन 65 रुपये प्रति घंटे की सब्सिडी दर पर उपलब्ध कराया जा रहा है। यह दर वैश्विक औसत लागत की लगभग एक-तिहाई है। ये डेटा सेंटर मुंबई, नवी मुंबई, हैदराबाद, बंगलूरू, नोएडा और जामनगर सहित देश के विभिन्न हिस्सों में स्थित हैं।

सरकार का कहना है कि वह डेटा सेंटर इकोसिस्टम की जरूरतों, विशेष रूप से बिजली और पानी की मांग, को लेकर सजग है। एआई और बड़े डेटा सेंटरों के विस्तार से बढ़ने वाली बिजली मांग को सरकारी योजना प्रक्रिया में शामिल किया गया है। ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार, 2031-32 तक डेटा सेंटरों से बिजली की मांग 13.56 गीगावाट तक पहुंचने का अनुमान है।

इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय बिजली ट्रांसमिशन अवसंरचना का लगातार विस्तार किया जा रहा है, ताकि विभिन्न क्षेत्रों में विश्वसनीय बिजली आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।

हाल ही में संसद ने ‘सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया’ (SHANTI) अधिनियम पारित किया है। सरकार के अनुसार यह कानून छोटे मॉड्यूलर और माइक्रो न्यूक्लियर रिएक्टरों के भविष्य के विकास को समर्थन देगा, जिससे एआई और डेटा सेंटर जैसे उभरते क्षेत्रों के लिए विश्वसनीय ऊर्जा समाधान उपलब्ध कराए जा सकेंगे।

भारत का डेटा सेंटर बाजार

आईएमएआरसी की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय डेटा सेंटर बाजार का आकार  2025 में लगभग 5.55 अरब डॉलर आंका गया था, जो 2034 तक बढ़कर 13.11 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। 2026 से 2034 के बीच इस क्षेत्र में औसतन 10.01 प्रतिशत की वार्षिक चक्रवृद्धि वृद्धि दर (CAGR) रहने का अनुमान है।

भारत को लेकर रिपोर्ट में क्या दावा किया गया?

क्रॉस डिपेंडेंसी इनिशिएटिव की रिपोर्ट के अनुसार, भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां भविष्य के डेटा सेंटर जलवायु जोखिमों के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं। अध्ययन में भारत के 41 प्रस्तावित डेटा सेंटरों का विश्लेषण किया गया, जिनमें से पांच को पहले से ही उच्च जोखिम श्रेणी में रखा गया है। रिपोर्ट के अनुसार 2026 से 2100 के बीच भारत में डेटा सेंटरों को होने वाले औसत जलवायु नुकसान का जोखिम 269% तक बढ़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चरम मौसमीय घटनाओं के कारण डेटा सेंटरों को होने वाले संभावित नुकसान के जोखिम के मामले में भारत दुनिया के 11वें स्थान पर है। 

सबसे बड़ी चिंता यह है कि तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्य, जो भारत के प्रमुख टेक्नोलॉजी और डेटा सेंटर हब बन रहे हैं, दुनिया के उन क्षेत्रों में शामिल हैं जहां अत्यधिक गर्मी के कारण परिचालन बाधित होने का खतरा सबसे ज्यादा है।

गर्मी क्यों बन रही सबसे बड़ा खतरा?

जब भी जलवायु परिवर्तन की बात होती है तो लोगों का ध्यान बाढ़, चक्रवात या समुद्री तूफानों पर जाता है। लेकिन डेटा सेंटरों के लिए सबसे बड़ा खतरा अक्सर अत्यधिक गर्मी होती है। डेटा सेंटरों के भीतर हजारों सर्वर लगातार काम करते हैं और भारी मात्रा में गर्मी पैदा करते हैं। इन्हें ठंडा रखने के लिए बड़े कूलिंग सिस्टम लगाए जाते हैं। यदि बाहरी तापमान बहुत अधिक हो जाए तो:

  • सर्वर की कार्यक्षमता घट सकती है।
  • कूलिंग सिस्टम पर दबाव बढ़ सकता है।
  • बिजली की खपत बढ़ जाती है।
  • बिजली ग्रिड पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
  • सर्विस बाधित होने या सिस्टम फेल होने का खतरा बढ़ जाता है।

रिपोर्ट के अनुसार भारत, ब्राजील, मैक्सिको, इंडोनेशिया और स्पेन जैसे देशों में 75% से अधिक प्रस्तावित डेटा सेंटर अत्यधिक गर्मी से जुड़े उच्च परिचालन जोखिम का सामना कर सकते हैं।

खतरा सिर्फ डेटा सेंटर तक सीमित नहीं

विशेषज्ञों का कहना है कि डेटा सेंटर भले ही मजबूत इमारतों में बनाए जाएं, लेकिन वे अकेले काम नहीं करते। उनकी निर्भरता कई बाहरी व्यवस्थाओं पर होती है, जैसे, बिजली आपूर्ति, इंटरनेट और दूरसंचार नेटवर्क, सड़क और परिवहन व्यवस्था, जल आपूर्ति और सप्लाई चेन।

अगर किसी हीटवेव, बाढ़ या चक्रवात के दौरान इनमें से कोई व्यवस्था प्रभावित होती है, तो डेटा सेंटर भी काम करना बंद कर सकते हैं। विश्लेषण में पाया गया कि जब इन अप्रत्यक्ष जोखिमों को भी शामिल किया गया तो परिचालन व्यवधान का खतरा लगभग 10 गुना तक बढ़ गया। 

क्या बढ़ सकता है जल संकट?

जलवायु जोखिम के साथ-साथ एआई डेटा सेंटरों की बढ़ती ऊर्जा और पानी की मांग भी चिंता का विषय बन रही है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक एआई डेटा सेंटरों की बिजली खपत 945 टेरावाट-घंटे तक पहुंच सकती है। यह पाकिस्तान, बांग्लादेश और नाइजीरिया की कुल वार्षिक बिजली खपत से लगभग तीन गुना अधिक है।

रिपोर्ट के मुताबिक केवल 2025 में दुनिया भर के डेटा सेंटरों ने लगभग 448 TWh बिजली की खपत की। अगर डेटा सेंटरों को एक अलग देश माना जाए तो वे बिजली उपभोग के मामले में दुनिया के 11वें सबसे बड़े उपभोक्ता होते।

डेटा सेंटरों में लगे कूलिंग सिस्टम को बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक डेटा सेंटरों की बिजली खपत से जुड़ा जल पदचिह्न 9.3 ट्रिलियन लीटर तक पहुंच सकता है। यह मात्रा इतनी है कि इससे उप-सहारा अफ्रीका के 1.3 अरब लोगों की एक वर्ष की न्यूनतम घरेलू जल आवश्यकता पूरी की जा सकती है। 

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